भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की विचारधारा की जननी माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपनी स्थापना के 100 साल पूरे कर लिए हैं। इस ऐतिहासिक मौके पर नागपुर में आयोजित शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिरकत की और देशवासियों को संबोधित किया। इस अवसर पर एक विशेष स्मारक सिक्का और पोस्टकार्ड भी जारी किया गया, जो संघ के सौ साल के सफर को याद कराता है।

प्रधानमंत्री मोदी ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री मोदी ने इस ऐतिहासिक पल को ‘अमृत काल‘ का नाम दिया। उन्होंने कहा कि आरएसएस ने अपने 100 साल के सफर में देश की संस्कृति और समाज की सेवा की है। उन्होंने संघ के पूर्व सरसंघचालकों और स्वयंसेवकों के योगदान को याद किया। पीएम मोदी ने जोर देकर कहा कि संघ हमेशा ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना से काम करता आया है और देश की एकता व अखंडता को सर्वोपरि मानता है। उन्होंने कहा कि आज का दिन हर देशवासी के लिए गर्व का दिन है। पीएम मोदी ने यह भी कहा कि संघ ने हजारों-लाखों युवाओं को देशभक्ति और समाज सेवा का पाठ पढ़ाया है। उन्होंने कहा, “संघ ने समाज के हर वर्ग को जोड़ने का काम किया है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।”
आरएसएस का इतिहास और शुरुआत
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 27 सितंबर, 1925 को विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। शुरुआत में इसके सिर्फ पांच लोग ही सदस्य थे। डॉ. हेडगेवार का मानना था कि एक मजबूत और संगठित राष्ट्र के निर्माण के लिए समाज के चरित्र निर्माण की जरूरत है। इसी विचार के साथ संघ की नींव रखी गई। आज यह दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक है। संघ का पहला शाखा स्थल नागपुर में ही था और धीरे-धीरे यह पूरे देश में फैल गया। डॉ. हेडगेवार के बाद माधव सदाशिव राव गोलवल्कर संघ के सरसंघचालक बने और उन्होंने संगठन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया।
सदस्यों को ‘स्वयंसेवक’ क्यों कहते हैं?
RSS के सदस्यों को ‘स्वयंसेवक’ यानी ‘वॉलंटियर’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे बिना किसी वेतन या लालच के, स्वेच्छा से देश और समाज की सेवा के लिए काम करते हैं। यह संगठन अपने कार्यकर्ताओं में अनुशासन, देशभक्ति, समाज सेवा और चरित्र निर्माण की भावना विकसित करता है। ‘स्वयंसेवक’ शब्द इसी सेवा भाव और निस्वार्थ समर्पण को दर्शाता है। स्वयंसेवक सफेद कमीज और खाकी शॉर्ट्स (नीकेर) की वर्दी पहनते हैं, जो अनुशासन और एकता का प्रतीक है। वे रोज सुबह शाखा में एकत्रित होकर शारीरिक प्रशिक्षण, खेल, और विचार-विमर्श करते हैं।

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समारोह की खास बातें
इस शताब्दी समारोह में देशभर से हजारों स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में आरएसएस के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत भी मौजूद थे और उन्होंने भी संबोधित किया। उन्होंने कहा कि संघ आगे भी देश सेवा के अपने मिशन को जारी रखेगा। इस मौके पर जारी किए गए विशेष सिक्के की कीमत 100 रुपये है और यह चांदी का बना हुआ है। सिक्के के एक तरफ अशोक स्तंभ और दूसरी तरफ आरएसएस का लोगो और ‘100 वर्ष’ लिखा हुआ है। विशेष पोस्टकार्ड पर आरएसएस के सौ साल के सफर की झलक देखने को मिलती है।
इस समारोह का क्या महत्व है?
आरएसएस का 100 वर्षों का सफर अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह समारोह सिर्फ एक संगठन के जन्मदिन का जश्न नहीं, बल्कि उस विचारधारा और मूल्यों का उत्सव है, जिस पर संघ का निर्माण हुआ था। इस मौके पर संघ के मौजूदा सरसंघचालक मोहन भागवत ने भी संबोधित किया और संगठन के भविष्य के लक्ष्यों के बारे में बताया। विशेष सिक्के और पोस्टकार्ड के जारी होने से इस ऐतिहासिक घटना को एक स्थायी प्रतीक मिल गया है। यह समारोह संगठन की विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का एक माध्यम भी है। संघ के इस समारोह को देखकर यह साफ होता है कि यह संगठन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सौ साल पहले था।
संक्षेप में कहें तो, आरएसएस का शताब्दी समारोह देश के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है, जिसने एक बार फिर संगठन और उसके विचारों को राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बना दिया है। यह समारोह न सिर्फ अतीत का जश्न है बल्कि भविष्य की योजनाओं का आधार भी है। आरएसएस के इस सौ साल के सफर ने देश को कई महान नेता दिए हैं और समाज को एक नई दिशा देने का काम किया है।









