जमीन खरीदने के बाद भी नहीं बनेंगे पूरे मालिक! रजिस्ट्री के बाद म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) सहित ये काम हैं जरूरी

दाखिल-खारिज का नया नियम: जमीन खरीदना हर किसी का सपना होता है और इसमें जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई लग जाती है। ऐसे में जब इतना पैसा लग रहा है तो सावधानी बरतना बहुत जरूरी है। अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि जमीन की रजिस्ट्री करा लेने भर से वे उसके पूरे मालिक बन गए। लेकिन, हकीकत इससे उलट है। कानूनी रूप से जमीन का असली मालिक वही है, जिसका नाम सरकार के राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हो और जो हर साल भू-कर (लैंड टैक्स) की रसीद कटवा रहा हो।

दाखिल-खारिज का नया नियम
दाखिल-खारिज का नया नियम

 

रजिस्ट्री अकेली काफी नहीं है

जमीन खरीदने के बाद सबसे पहला कदम रजिस्ट्री (जिसे केबाला या डीड भी कहते हैं) का होता है। यह काम सब-रजिस्ट्रार के कार्यालय में होता है और इसकी एक कॉपी खरीदार को मिल जाती है। हालांकि, केवल रजिस्ट्री हो जाने से आप जमीन के पूर्ण मालिक नहीं बन जाते। यह सिर्फ यह साबित करती है कि जमीन का लेन-देन हुआ है और एक समझौता हस्ताक्षरित हुआ है।

म्यूटेशन (दाखिल-खारिज) है सबसे जरूरी

रजिस्ट्री के बाद की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है म्यूटेशन या दाखिल-खारिज। इस प्रक्रिया के द्वारा ही सरकारी रिकॉर्ड में पुराने मालिक का नाम हटाकर नए खरीदार (आपका) नाम दर्ज किया जाता है। जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक सरकार की नजर में जमीन के मालिक पुराने वाले ही बने रहते हैं।

म्यूटेशन की प्रक्रिया तीन स्तरों से गुजरती है:

  1. सबसे पहले राजस्व कर्मचारी (जैसे लेखपाल) के पास आवेदन जाता है।

  2. फिर यह आवेदन राजस्व अधिकारी (जैसे तहसीलदार) के पास जाता है।

  3. अंत में, अंचल अधिकारी (जैसे SDM या CO) इसकी अंतिम रिपोर्ट तैयार करते हैं।

जब यह तीनों स्टेप पूरे हो जाते हैं, तभी म्यूटेशन की प्रक्रिया पूरी मानी जाती है।

जमाबंदी में नाम दर्ज होना है जरूरी

म्यूटेशन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद आपका नाम जमाबंदी रजिस्टर (लैंड रिकॉर्ड) में दर्ज हो जाता है। इसके बाद ही आप जमीन के वास्तविक और कानूनी मालिक माने जाते हैं। यह रिकॉर्ड ऑनलाइन भी उपलब्ध होता है, जिसे आप कभी भी देख सकते हैं।

दाखिल-खारिज का नया नियम
दाखिल-खारिज का नया नियम

 

भू-कर की रसीद है मालिकाने की अहम सबूत

म्यूटेशन के बाद का सबसे अहम काम है हर साल भू-कर (लैंड टैक्स) की रसीद कटवाना। यह रसीद आपके मालिकाना हक का सबसे मजबूत सबूत मानी जाती है। इससे साबित होता है कि जमीन पर आपका कब्जा है और आप सरकार को कर दे रहे हैं। अगर आप भू-कर नहीं भरते, तो इससे जमीन पर आपके दावे को चुनौती मिल सकती है।

 

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विवादों से बचने के लिए यह सावधानियां बरतें

किसी भी जमीन को खरीदने से पहले इन बातों का ध्यान जरूर रखें:

  • दस्तावेजों की जांच: जमीन के सभी जरूरी दस्तावेज जैसे खतौनी, खेसरा नक्शा आदि की अच्छी तरह जांच कर लें।

  • कानूनी रोक की जांच: सुनिश्चित करें कि जमीन पर किसी अदालत की कोई रोक (स्टे), बंधक (मॉर्टगेज) या कुर्की (अटैचमेंट) तो नहीं है।

  • मौके पर जाएं: जमीन का मुआयना खुद जाकर जरूर करें और पड़ोसियों से भी इसकी पुष्टि कर लें।

उत्तर प्रदेश में दाखिल-खारिज के नए नियम 2025

उत्तर प्रदेश सरकार ने 2025 में दाखिल-खारिज (जमीन के नामांतरण) की प्रक्रिया को लेकर कई बड़े बदलाव किए हैं। इन बदलावों का मकसद है कि जमीन से जुड़ी फाइलों को समय पर निपटाया जाए और लोगों को तहसीलों के चक्कर न लगाने पड़ें।

Note- रियल टाइम खतौनी की नक़ल देखने के लिए उत्तर प्रदेश भूलेख की ऑफिशल वबसाइट https://upbhulekh.gov.in/ पर जाकर देखा जा सकता है

1. समय सीमा तय

अब गैर-विवादित दाखिल-खारिज के मामलों को 45 दिन के अंदर निपटाना अनिवार्य कर दिया गया है। वहीं अगर मामला विवादित है तो इसे 90 दिन के भीतर निपटाना होगा। इससे पहले कोई तय सीमा नहीं थी, इसलिए लोग महीनों तक फाइल अटकी रहने की शिकायत करते थे।

 

2. रजिस्ट्री के साथ ही दाखिल-खारिज

सबसे बड़ी राहत यह है कि आने वाले समय में जब जमीन की रजिस्ट्री होगी, उसी के साथ खतौनी में नाम चढ़ाने की प्रक्रिया अपने आप पूरी हो जाएगी। यानी तहसील में जाकर अलग से दाखिल-खारिज कराने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

 

3. शुल्क में राहत

नगर निगम और नगर पालिका क्षेत्रों में दाखिल-खारिज शुल्क को घटाकर सरल बनाया गया है। अब इसकी अधिकतम सीमा भी तय कर दी गई है ताकि कोई मनमाना शुल्क न वसूला जा सके। उदाहरण के लिए लखनऊ नगर निगम सीमा में म्यूटेशन चार्ज अब ₹10,000 से अधिक नहीं लिया जाएगा।

 

4. समान शुल्क व्यवस्था

राज्य सरकार यह भी सुनिश्चित कर रही है कि यूपी के सभी नगर निकायों में दाखिल-खारिज की फीस एक जैसी रहे। पहले अलग-अलग शहरों में अलग दरें लागू थीं, जिससे लोगों को असमानता झेलनी पड़ती थी।

 

5. जवाबदेही तय

अब यदि दाखिल-खारिज के मामलों में देरी होती है तो उसकी जिम्मेदारी सीधे जिलाधिकारी और मंडलायुक्त पर होगी। इस नियम से अधिकारियों पर दबाव रहेगा कि वे समय पर काम पूरा करें और लोगों को अनावश्यक परेशानी न हो।

 

निष्कर्ष:

जमीन की रजिस्ट्री कराना केवल पहला कदम है। असली मालिक बनने के लिए म्यूटेशन की प्रक्रिया पूरी करना और नियमित रूप से भू-कर अदा करना बेहद जरूरी है। इन सभी चरणों को पूरा करने के बाद ही आप जमीन के पक्के और निश्चिंत मालिक बन सकते हैं और भविष्य में होने वाले किसी भी कानूनी विवाद से अपने आप को बचा सकते हैं।

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