आरक्षण सीमा: एक ऐसा मामला जो पूरे देश में आरक्षण की तस्वीर बदल सकता है, सुप्रीम कोर्ट के सामने है। मध्य प्रदेश सरकार ने आरक्षण की 50% की सीमा को तोड़ने का एक बड़ा दांव खेला है। सरकार राज्य में आरक्षण को 50% से बढ़ाकर 73% करना चाहती है। इसके लिए उसने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है। 8 अक्टूबर से इस मामले की रोजाना सुनवाई शुरू होगी और पूरे देश की नजरें इस पर टिकी हैं। इस एक फैसले से करोड़ों लोगों का भविष्य तय होगा।

50% की सीमा कहाँ से आई? इंदिरा साहनी केस की पूरी कहानी
आरक्षण पर यह 50% की लक्ष्मण रेखा 1992 में सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले से बनी थी। इसकी शुरुआत 1990 में हुई जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करते हुए OBC यानी अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण का ऐलान किया। इसके खिलाफ देश भर में भारी विरोध प्रदर्शन हुए और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इसे ‘इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार’ केस के नाम से जाना जाता है।
उस समय कोर्ट की 9 जजों की एक बेंच ने 6-3 के बहुमत से एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने OBC को 27% आरक्षण देने को तो सही ठहराया, लेकिन एक महत्वपूर्ण शर्त जोड़ी। फैसले में कहा गया कि कुल आरक्षण (एससी, एसटी, ओबीसी मिलाकर) किसी भी हाल में 50% से ज्यादा नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यह सीमा समानता के अधिकार को बनाए रखने और सामाजिक संतुलन के लिए जरूरी है।
हालाँकि, कोर्ट ने एक रास्ता भी छोड़ा था। उसने कहा था कि अगर किसी राज्य की स्थिति इतनी खास और असाधारण है कि 50% सीमा में रहकर न्याय नहीं हो पा रहा, तो इसे तोड़ा जा सकता है। इसी ‘असाधारण परिस्थिति’ वाले बिंदु पर अब मध्य प्रदेश सरकार अपना पक्ष रखेगी।
मध्य प्रदेश ने क्या कदम उठाया? 73% आरक्षण सीमा का गणित
साल 2019 में, तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) का आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% कर दिया। इस कदम के बाद मध्य प्रदेश में आरक्षण का हिसाब कुछ इस तरह बना:
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अनुसूचित जाति (SC): 16%
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अनुसूचित जनजाति (ST): 20%
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अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 27%
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आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS): 10%
इन सभी को जोड़ने पर कुल आरक्षण 73% हो गया, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय 50% की सीमा से कहीं अधिक है। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती मिली जहाँ इसे रद्द कर दिया गया और अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है।
मध्य प्रदेश सरकार के मजबूत तर्क
मध्य प्रदेश सरकार ने अपने इस फैसले को सही ठहराने के लिए सुप्रीम कोर्ट में कई मजबूत तर्क दिए हैं:

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आबादी का अनुपात: सरकार का कहना है कि राज्य की 51% से अधिक आबादी ओबीसी की है (2011 की जनगणना के आधार पर)। ऐसे में, उन्हें केवल 14% आरक्षण देना अन्यायपूर्ण है। सरकार का दावा है कि आबादी के हिसाब से आरक्षण मिलना चाहिए।
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पिछड़ापन: सरकार ने आंकड़े देकर दिखाया है कि ओबीसी समुदाय शिक्षा, सरकारी नौकरियों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अभी भी बहुत पीछे है। उनकी स्थिति में सुधार लाने के लिए 27% आरक्षण देना जरूरी है।
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असाधारण परिस्थिति: सरकार का कहना है कि मध्य प्रदेश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति एक ‘असाधारण परिस्थिति’ है जहाँ 50% सीमा में रहते हुए OBC समुदाय के साथ न्याय नहीं हो पा रहा। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस सीमा को लचीला बनाना चाहिए।
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दूसरे राज्यों का क्या अनुभव रहा है? सफलता और असफलता की कहानियाँ
मध्य प्रदेश से पहले भी कई राज्यों ने 50% की सीमा तोड़ने की कोशिश की है, लेकिन सभी को सफलता नहीं मिली:
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तमिलनाडु (सफलता): तमिलनाडु में 69% आरक्षण लागू है। इसे ‘असाधारण परिस्थिति’ मानते हुए संसद ने मंजूरी दे दी और इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल कर दिया गया, ताकि इसे कोर्ट में चुनौती न दी जा सके। तमिलनाडु ने यह साबित कर दिया कि अगर राज्य के पास मजबूत आंकड़े और राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो 50% सीमा तोड़ी जा सकती है।
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महाराष्ट्र (असफलता): मराठा समुदाय को आरक्षण देकर कुल आरक्षण 68% तक ले जाने की कोशिश को सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मराठा समुदाय को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा साबित नहीं किया जा सका है और उन्हें आरक्षण देने की जरूरत नहीं है।
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बिहार (असफलता): बिहार में भी आरक्षण बढ़ाने के प्रयास को पटना हाईकोर्ट ने पर्याप्त और विश्वसनीय आंकड़े न होने का हवाला देकर रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस आंकड़ों के आरक्षण बढ़ाना संविधान के खिलाफ है।
क्या फायदा होगा अगर MP को सफलता मिलती है?
अगर मध्य प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपना मामला जीत जाती है, तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे:
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OBC समुदाय को बड़ा लाभ: सबसे बड़ा फायदा OBC समुदाय को होगा। उन्हें नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में 27% आरक्षण मिल सकेगा, जिससे उनका प्रतिनिधित्व बढ़ेगा।
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अन्य राज्यों के लिए रास्ता: मध्य प्रदेश की सफलता दूसरे राज्यों के लिए एक उदाहरण बनेगी। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्य जहाँ OBC आबादी अधिक है, वे भी अपने यहाँ आरक्षण की सीमा बढ़ाने के लिए प्रयास कर सकते हैं।
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सामाजिक न्याय को बल: इससे सामाजिक न्याय की मुहिम को एक नई ताकत मिलेगी। यह साबित होगा कि आबादी के अनुपात में आरक्षण दिया जा सकता है।
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राजनीतिक बदलाव: इस फैसले का राजनीतिक असर भी बहुत बड़ा होगा। OBC वोटों पर दावेदारी करने वाली पार्टियों के लिए यह एक बड़ी जीत साबित होगी।
क्या नुकसान हो सकते हैं? चुनौतियाँ और चिंताएँ
वहीं दूसरी ओर, अगर आरक्षण की सीमा बढ़ती है तो इसके कुछ नुकसान और चुनौतियाँ भी हैं:

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सामान्य वर्ग पर असर: आरक्षण 73% होने से सामान्य वर्ग के लिए केवल 27% सीटें बचेंगी। इससे उनके लिए प्रतिस्पर्धा और कठिन हो जाएगी और वंचना की भावना पैदा हो सकती है।
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योग्यता पर सवाल: आलोचकों का मानना है कि इतना अधिक आरक्षण योग्यता के सिद्धांत को कमजोर करेगा। उनका तर्क है कि इससे शिक्षण संस्थानों और सरकारी विभागों की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है।
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समाज में टकराव: आरक्षण बढ़ने से अलग-अलग समुदायों के बीच तनाव बढ़ सकता है। इससे सामाजिक सौहार्द को खतरा हो सकता है।
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आरक्षण का असली मकसद खत्म होना: कई विशेषज्ञ मानते हैं कि आरक्षण का मकसद समाज के पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाना था, न कि इसे एक स्थायी व्यवस्था बनाना। इतना अधिक आरक्षण इस व्यवस्था को स्थायी बना सकता है।
आगे की राह क्या है? सुप्रीम कोर्ट किन बातों पर देगा ध्यान
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इस मामले की दिशा तय करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ पिछड़ापन ही आरक्षण का एकमात्र आधार नहीं है। कोर्ट यह भी देखेगा कि क्या सरकारी नौकरियों में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व वाकई कम है और क्या इतना ज्यादा आरक्षण देने से प्रशासन की कार्यक्षमता पर बुरा असर नहीं पड़ेगा।
कोर्ट मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पेश आंकड़ों की विश्वसनीयता की जाँच करेगा। साथ ही, यह देखेगा कि क्या मध्य प्रदेश की स्थिति वाकई इतनी ‘असाधारण’ है कि 50% सीमा तोड़ने की जरूरत है।
निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि यह मामला सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है। अगर सुप्रीम कोर्ट मध्य प्रदेश के पक्ष में फैसला देता है, तो इससे देश के कई अन्य राज्यों में भी आरक्षण की सीमा बढ़ाने का रास्ता खुल जाएगा। यह फैसला न सिर्फ लाखों युवाओं के भविष्य, बल्कि देश की सामाजिक और राजनीतिक दशा और दिशा दोनों को प्रभावित करेगा। 8 अक्टूबर से शुरू होने वाली इस सुनवाई का इंतज़ार पूरा देश कर रहा है।









