नेपाल की प्रधानमंत्री सुशीला कार्की: Gen-Z आंदोलन ने नेपाल की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव लाया

नेपाल में एक बार फिर से एक महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। देश की पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की (Sushila karki) को नेपाल का अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया है। यह फैसला नेपाल की बदलती राजनीति और Gen-Z आंदोलन का सीधा परिणाम है, न कि सिर्फ एक संवैधानिक प्रक्रिया।

यह कदम नेपाल में एक नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है, जो वर्षों से राजनीतिक अस्थिरता, भ्रष्टाचार और नेतृत्व की कमी से जूझ रहा है। विशेष रूप से, नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री सुशीला कार्की बनने से देश की राजनीति में नई ऊर्जा आई है, साथ ही युवा महिलाओं और महिलाओं के लिए एक मजबूत संदेश गया है।

सुशीला कार्की: न्यायपालिका से नेपाल प्रधानमंत्री की यात्रा

सुशीला कार्की का करियर बहुत प्रेरक रहा है।

1. 1979 में विराटनगर में वकालत करने लगे।
2. 2009 में वे सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश बनीं।
3. 2016 में पहली महिला सीजेएम बनीं।
4. अपने कार्यकाल में उन्होंने भ्रष्टाचारविरोधी कई ऐतिहासिक निर्णय लिए।

यही छवि ने उन्हें अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया। जनता, खासकर युवा पीढ़ी, उन्हें भ्रष्टाचार और पारंपरिक राजनीतिक बंधनों से मुक्त नेता मानती है।

यह बदलाव नेपाल की राजनीति में क्यों महत्वपूर्ण है?

पिछले कुछ समय से नेपाल की राजनीति अस्थिर रही है।

1. बार-बार सरकारों का गिरना और पुनर्गठन होना;

2. भ्रष्टाचार के बारे में लगातार शिकायतें;

3. युवाओं की बात ना सुनना

इन सब कारणों से आम लोगों ने पारंपरिक राजनीतिक दलों पर अपना भरोसा खो दिया। यही कारण है कि Gen-Z आंदोलन ने राजनीति को ही बदल दिया जब वह सड़कों पर आया।
युवा पीढ़ी ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्हें ईमानदार और निष्पक्ष नेता चाहिए। इसलिए सुशीला कार्की का नाम चर्चा में आया जब वे नेपाल की अंतरिम प्रधानमंत्री बनीं।

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जन-ज़ी आंदोलन और नेपाल की राजनीतिक परिवर्तन

नेपाल की सरकार ने हाल ही में कुछ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर बैन लगाया, जिससे देश में राजनीतिक संकट पैदा हुआ। युवा लोग पहले से ही भ्रष्टाचार से आक्रोशित थे और सड़कों पर उतरे।

  •  तीन दिन लगातार आंदोलन चला।
  •  राजधानी काठमांडू में हजारों लोग प्रदर्शन में शामिल हुए।
  •  दबाव इतना बढ़ गया कि पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया।

इस आंदोलन ने साफ कर दिया कि पारंपरिक दलों को नेपाल की राजनीति में जगह तभी मिलेगी जब वे जनता और खासकर युवाओं की उम्मीदों को पूरा करेंगे।

 

और नाम क्यों नहीं दिखाए गए?

अंतरिम प्रधानमंत्री पद के लिए बहुत से नाम थे, लेकिन अंततः सुशीला कार्की चुनी गईं।

1. कुल घिसिंग: बिजली संकट का समाधान करने वाले इंजीनियर

2. बालेन्द्र शाह (बालेन): काठमांडू का मेयर और युवा लोगों में लोकप्रिय नेता

लेकिन घिसिंग को अनुभव की कमी थी और बालेन शाह ने खुद इस पद को नहीं लिया था, इसलिए सुशीला कार्की का रास्ता साफ था। शाह ने खुले तौर पर उनके नाम का समर्थन किया।

 

अंतरिम सरकार की मंशा

अंतरिम नेपाल की प्रधानमंत्री सुशीला कार्की की सरकार की पहली प्राथमिकताओं में से एक होगा:

1. एक छोटे और प्रभावी मंत्रिमंडल बनाना।
2. संघीय संसद और सातों राज्यसभाओं को भंग करना।
3. कानून बहाल करना और स्थिरता लाना
4. पारदर्शी विकल्पों की योजना बनाना

यह भी चर्चा है कि परिस्थितियां बिगड़ने पर अंतरिम सरकार आपातकालीन कार्रवाई कर सकती है ताकि देश को अशांति से बचाया जा सके।

नेपाल की जनता अब सुशीला कार्की से उम्मीद करती है कि वे राजनीतिक अस्थिरता को दूर करेंगे और एक नई शुरुआत की ओर ले जाएंगे।

  • युवा लोगों का मानना है कि वे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करेंगे।
  • वे महिला होने के कारण भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ा देंगे।
  • वे संकट का समाधान निकाल सकते हैं क्योंकि उनके पास न्यायपालिका से लेकर प्रशासन तक का विस्तृत अनुभव है।

 

नेपाल राजनीति में भविष्य की चुनौतियां

सुशीला कार्की के सामने भी कई चुनौतियां हैं।

1. जनता का सबसे बड़ा संकट आर्थिक संकट और महंगाई है।
2. पारंपरिक दल राजनीतिक अस्थिरता के कारण अपनी जगह खोना नहीं चाहते।
3. युवा पीढ़ी की उम्मीदें बहुत ऊंची हैं और अगर वे पूरा नहीं करते तो वे निराश हो जाएंगे।

नेपाल में सुशीला कार्की का प्रधानमंत्री बनना केवल एक संवैधानिक कदम नहीं है; यह एक Gen-Z आंदोलन की जीत है। यह घटना दिखाती है कि लोग, खासकर युवा, अब स्पष्ट और खुले नेतृत्व चाहते हैं।

कार्की, नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में, लोकतंत्र को मजबूत करने, भ्रष्टाचार पर काबू पाने और देश को स्थिर करने की बड़ी जिम्मेदारी है। यदि वे इन चुनौतियों को सफलतापूर्वक पार करती हैं, तो वे नेपाल की राजनीति में और पूरे दक्षिण एशिया में एक मिसाल बन जाएंगे।

 

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