Nepal Protest News डिजिटल डेस्क। नेपाल इस समय बड़े राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा है। पिछले कई दिनों से देश की सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं। संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और सर्वोच्च न्यायालय तक प्रदर्शनकारियों के कब्जे में चले गए हैं। अब तक 22 लोगों की मौत हो चुकी है और 400 से ज्यादा लोग घायल हैं। हालात इतने बिगड़े कि प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा और सेना उन्हें हेलिकॉप्टर से अज्ञात स्थान पर ले गई। सवाल यह है कि आखिर नेपाल में यह इतना बड़ा आंदोलन क्यों भड़का?

सोशल मीडिया बैन से शुरू हुई चिंगारी
Nepal Protest News के मुताबिक, यह विरोध प्रदर्शन तब शुरू हुआ जब सरकार ने सोशल मीडिया पर बैन लगाने का फैसला किया। सरकार का तर्क था कि सोशल मीडिया पर अफवाहें और भ्रामक जानकारी फैल रही है। लेकिन युवाओं ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला माना। खासकर जेनरेशन जेड (1997–2012 के बीच जन्मे युवा) के लिए सोशल मीडिया उनकी आवाज है। यही कारण था कि यह बैन उनके गुस्से की चिंगारी बन गया और देखते ही देखते आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया।
नेताओं की ऐशो-आराम भरी जिंदगी और जनता पर पाबंदी
नेपाल में बेरोजगारी और महंगाई लगातार बढ़ रही है। युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही, लेकिन नेताओं के बच्चे विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं, महंगी पार्टियां कर रहे हैं और लग्जरी लाइफ जी रहे हैं। सोशल मीडिया पर “नेपो बेबी” कैंपेन ट्रेंड करने लगा, जिससे आम युवाओं का गुस्सा और भड़क गया। लोगों को लगा कि नेताओं के परिवारों को पूरी छूट है, जबकि जनता पर बैन और पाबंदियां लगाई जा रही हैं।
तीन बड़े घोटाले और जनता का गुस्सा
Nepal Protest News बताता है कि पिछले चार साल में नेपाल में तीन बड़े घोटाले हुए, जिनकी वजह से युवाओं का विश्वास पूरी तरह टूट गया—

- 2021: गिरी बंधु भूमि स्वैप घोटाला – 54,600 करोड़ रुपये।
- 2023: ओरिएंटल कोऑपरेटिव घोटाला – 13,600 करोड़ रुपये।
- 2024: कोऑपरेटिव घोटाला – 69,600 करोड़ रुपये।
इन घोटालों ने सरकार की साख खत्म कर दी। जनता को लगा कि नेताओं के लिए भ्रष्टाचार करना आसान है, लेकिन आम नागरिकों के लिए जिंदगी जीना मुश्किल। यही गुस्सा बाद में सड़कों पर उतर आया।
बेरोजगारी और आर्थिक बदहाली
नेपाल में बेरोजगारी दर 10% से ज्यादा हो चुकी है। महंगाई भी 5% से ऊपर पहुंच गई है। आर्थिक असमानता इतनी है कि केवल 20% लोग देश की 56% संपत्ति के मालिक हैं। इससे साफ है कि भ्रष्टाचार और गलत नीतियों ने नेपाल की अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया है। यही वजह है कि युवाओं ने सरकार को खुली चुनौती दी।
राजनीतिक अस्थिरता: 5 साल में तीन सरकारें
नेपाल में जुलाई 2021 से अब तक तीन प्रधानमंत्री बदल चुके हैं।
- जुलाई 2021 – शेर बहादुर देउबा।
- दिसंबर 2022 – पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’।
- जुलाई 2024 – केपी शर्मा ओली।
बार-बार सरकार बदलने से न तो स्थिरता आ पाई और न ही कोई ठोस विकास योजना लागू हो सकी। जनता का धैर्य टूटना लाज़मी था।
विदेशी दखल और नेपाल की पहचान का संकट
Nepal Protest News के मुताबिक, नेपाल लंबे समय से विदेशी ताकतों के बीच खींचतान का शिकार रहा है। कभी अमेरिका का प्रभाव, कभी भारत की नीतियां और अब चीन का दबाव। खासकर ओली सरकार पर आरोप है कि उन्होंने चीन के करीब जाकर भारत से दूरी बनाई। यहां तक कि नक्शे में लिपुलेख दर्रा दिखाकर भारत से विवाद खड़ा कर दिया। सोशल मीडिया बैन के बीच सिर्फ चीनी ऐप टिकटॉक चलने देना भी युवाओं के गुस्से को और भड़काने वाला कदम साबित हुआ।
आंदोलन क्यों खास है?
यह आंदोलन सिर्फ एक सोशल मीडिया बैन के खिलाफ नहीं है। यह एक पूरी पीढ़ी की नाराजगी का प्रतीक है—

- भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से तंग जनता।
- बेरोजगारी और महंगाई से परेशान युवा।
- विदेशी दखल और राजनीतिक अस्थिरता से टूटती पहचान।
Nepal Protest News दर्शाता है कि यह आंदोलन नेपाल की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है। पीएम ओली के इस्तीफे के बावजूद हिंसा रुक नहीं रही, जो बताता है कि यह संघर्ष अब सिर्फ सरकार बदलने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यवस्था परिवर्तन की मांग तक जा पहुंचा है।
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Nepal Protest News साफ करता है कि नेपाल में Gen-Z का यह आंदोलन देश के इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक संकट बन सकता है। सोशल मीडिया बैन ने जिस चिंगारी को जन्म दिया था, वह भ्रष्टाचार, घोटालों, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता की आग में बदल चुकी है। यदि सरकार ने जल्द ठोस कदम नहीं उठाए, तो यह आंदोलन नेपाल की पूरी राजनीतिक व्यवस्था को बदलकर रख देगा।









