UP असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा रद्द: उत्तर प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा भूचाल आया है। यूपी असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा, जो 16 और 17 अप्रैल 2025 को आयोजित की गई थी, को राज्य सरकार ने पूरी तरह से रद्द कर दिया है। यह फैसला तब आया जब परीक्षा में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं और एक संगठित नकल माफिया के चलन का खुलासा हुआ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर हुई गोपनीय जांच ने इस घोटाले की पोल खोल दी, जिसके बाद सरकार ने भर्ती प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह कड़ा कदम उठाया।
क्या था पूरा मामला? यूपी असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती घोटाला
उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग (UPSESC), प्रयागराज ने विज्ञापन संख्या-51 के तहत राज्य के सहायक आचार्य यानी असिस्टेंट प्रोफेसर के 1253 रिक्त पदों पर भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित की थी। यह परीक्षा पूरे उत्तर प्रदेश में निर्धारित केंद्रों पर दो दिन चली। हजारों मेधावी और पढ़े-लिखे युवाओं ने इस परीक्षा में भविष्य की उम्मीदों के साथ भाग लिया। लेकिन कुछ ही दिनों के भीतर, सूचनाएं आनी शुरू हो गईं कि परीक्षा में कुछ गड़बड़ है।

पहले तो सोशल मीडिया और अभ्यर्थियों की ओर से शिकायतें आईं। फिर यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) को कुछ गंभीर सुराग मिले। सूत्रों से पता चला कि एक संगठित गिरोह, जिसे आम बोलचाल में ‘नकल माफिया’ कहा जा रहा है, इस परीक्षा में सक्रिय था। इस गिरोह का तरीका बेहद सोफिस्टिकेटेड था। आरोप है कि गिरोह अवैध तरीके से पैसे लेकर अभ्यर्थियों को जवाब उपलब्ध करा रहा था, परीक्षा केंद्रों पर अपना प्रभाव जमा रहा था और पूरी प्रक्रिया को धंधा बना दिया था।
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सीएम योगी का कड़ा रुख और तत्काल जांच के आदेश
मामला जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जानकारी में आया तो उन्होंने तुरंत कार्रवाई का निर्देश दिया। सीएम योगी ने शिक्षा भर्ती में पारदर्शिता और निष्पक्षता पर हमेशा जोर दिया है। उनके निर्देश पर एक गोपनीय जांच शुरू की गई। इस जांच में STF और प्रशासनिक अधिकारियों ने साथ मिलकर काम किया। जांच में जो सामने आया, वह चौंकाने वाला था। परीक्षा के दौरान कथित तौर पर बड़े पैमाने पर धांधली, अनियमितताओं और अवैध धन वसूली के सबूत मिले।
मुख्यमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि जांच रिपोर्ट इतनी गंभीर थी कि पूरी परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए। ऐसे में, सीएम योगी ने भर्ती की विश्वसनीयता को सर्वोपरि रखते हुए पूरी परीक्षा को निरस्त करने का फैसला लिया। यह फैसला हज़ारों ईमानदार अभ्यर्थियों के हित में लिया गया है, ताकि किसी भी प्रकार की धांधली से भर्ती प्रक्रिया दूषित न हो।
नकल माफिया कैसे करता है काम? जानिए तरीका
इस पूरे यूपी असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा घोटाले में ‘नकल माफिया’ शब्द केंद्र में है। लेकिन यह माफिया आखिर है क्या? आमतौर पर, यह कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरा नेटवर्क होता है जो शिक्षा और भर्ती परीक्षाओं को अपना शिकार बनाता है। उनके काम करने के कुछ आम तरीके हैं:
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अंदरूनी सांठगांठ: कथित तौर पर, यह गिरोह परीक्षा आयोजित करने वाले संस्थानों या केंद्रों के कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों से मिलीभगत कर लेता है।
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टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग: आधुनिक तकनीक जैसे ब्लूटूथ डिवाइस, माइक्रो इयरफोन, मोबाइल फोन आदि का इस्तेमाल करके जवाब पहुंचाना।
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पेपर लीक: परीक्षा से पहले ही प्रश्न पत्र को अवैध तरीके से हासिल कर लेना और उसके आधार पर कोचिंग चलाना या जवाब बेचना।
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धमकी और भय: कई बार ईमानदार अभ्यर्थियों या केंद्र व्यवस्थापकों को धमकाया जाता है ताकि वे चुप रहें।
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ऊंची कीमत पर सुविधा: जो अभ्यर्थी बड़ी रकम देने को तैयार हैं, उन्हें परीक्षा हॉल में बैठे-बैठे जवाब उपलब्ध कराए जाते हैं।
इस बार की यूपी असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती में भी ऐसे ही कुछ तरीकों के इस्तेमाल के संकेत मिले हैं। STF की जांच इस बात पर केंद्रित है कि यह नेटवर्क कितना बड़ा है और इसके किन-किन लोगों से तार जुड़े हुए हैं।
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पिछले रिकॉर्ड और यूपी सरकार की कार्रवाई
यह पहली बार नहीं है जब उत्तर प्रदेश में भर्ती परीक्षाओं के आसपास विवाद खड़ा हुआ है। हालांकि, योगी आदित्यनाथ सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में इन माफियाओं के खिलाफ कई बड़े ऑपरेशन चलाए हैं। पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि सिर्फ पिछले दो साल में भर्ती घोटालों से जुड़े दर्जनों गिरोह सदस्य गिरफ्तार किए गए हैं।
एक बड़ा मामला यूपी पुलिस कांस्टेबल भर्ती का था, जिसमें कड़ी कार्रवाई हुई। इसी तरह, टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) और अन्य शिक्षक भर्तियों में भी सरकार ने सख्त रुख अपनाया है। इस बार असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा रद्द करने का फैसला इसी नीति का विस्तार है। सरकार का संदेश साफ है – भर्ती में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी, चाहे इसके लिए पूरी परीक्षा ही क्यों न रद्द करनी पड़े।
रद्द होने के बाद क्या होगा? भविष्य की राह
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि जिन 1253 पदों के लिए यूपी असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती हुई थी, उन पर अब भर्ती कैसे होगी? सरकारी सूत्रों के मुताबिक, शिक्षा सेवा चयन आयोग जल्द ही एक नई तिथि घोषित करेगा। पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू की जाएगी, लेकिन इस बार और भी सख्त सुरक्षा उपायों के साथ।
संभावना है कि:
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परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरों की निगरानी और कड़ाई बढ़ाई जाएगी।
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जिला प्रशासन और पुलिस की निगरानी में परीक्षा कराई जाएगी।
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ओएमआर शीट और अन्य दस्तावेजों की जांच प्रक्रिया और पुख्ता की जाएगी।
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शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई के लिए विशेष हेल्पलाइन शुरू की जा सकती है।
अभ्यर्थियों पर क्या असर? निराशा के साथ उम्मीद
निस्संदेह, इस परीक्षा रद्द के फैसले से हज़ारों ईमानदारी से तैयारी करने वाले अभ्यर्थी निराश हैं। उन्होंने महीनों मेहनत की, कोचिंग ली और परीक्षा दी। अचानक पूरी प्रक्रिया के रद्द होने से उनकी मेहनत पर पानी फिरता नज़र आ रहा है। सोशल मीडिया पर कई अभ्यर्थियों ने अपनी निराशा जाहिर की है।
हालांकि, ज्यादातर अभ्यर्थी और शिक्षाविद इस बात से सहमत हैं कि अगर परीक्षा में धांधली हुई है, तो इसे रद्द करना ही सही कदम था। एक ईमानदार अभ्यर्थी का कहना है, “हाँ, हमें दुख है कि फिर से तैयारी करनी पड़ेगी। लेकिन अगर नकल करने वालों की वजह से हमारी मेहनत बेकार होती तो उससे ज्यादा बुरा होता। सरकार ने सही फैसला लिया है।”
शिक्षा व्यवस्था और भर्ती प्रक्रिया: बड़े सवाल
यूपी असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा का यह विवाद सिर्फ एक परीक्षा रद्द होने तक सीमित मामला नहीं है। यह हमारी शिक्षा व्यवस्था और सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
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विश्वसनीयता का संकट: बार-बार भर्ती घोटालों से आम जनता का सिस्टम पर से भरोसा उठता है।
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योग्य युवाओं का नुकसान: जब नकलची और धांधली करने वाले आगे बढ़ते हैं, तो असली मेधावी युवा पीछे रह जाते हैं। इससे शिक्षा के स्तर पर सीधा असर पड़ता है।
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सिस्टम में सुधार की जरूरत: सिर्फ परीक्षा रद्द करना काफी नहीं है। पूरी भर्ती प्रक्रिया को इतना पारदर्शी और सुरक्षित बनाने की जरूरत है कि ऐसे माफिया उसमें सेंध लगाने की हिम्मत ही न कर सकें।









