भावनगर (गुजरात): भारत की समुद्री शक्ति को बढ़ावा देने और नई ऊँचाइयों तक पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को तीन बड़ी योजनाओं की घोषणा की। इन योजनाओं के लिए लगभग 70 हजार करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। इससे देश में करीब दो करोड़ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होने की उम्मीद है।

अमेरिका से टैरिफ और H-1B Visa जैसी चुनौतियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समुद्री शक्ति बढ़ावा दने और शिप बिल्डिंग सेक्टर में दूसरे देशों के ऊपर निर्भर न होकर आत्मनिर्भर बनने की दिशा की ओर एक और कदम बढ़ाया और इसके लिए तीन बड़ी योजनाओं की घोषणा की है। पीएम मोदी ने शनिवार को अन्य देशों पर भारत की निर्भरता को उसका मुख्य दुश्मन बताया और आत्मनिर्भरता के मूल मंत्र पर जोर देते हुए कहा कि “चिप हो या शिप…हमें भारत में ही बनाने होंगे”।
वह गुजरात में भावनगर के गांधी मैदान में ‘समुद्र से समृद्धि’ कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे, जहां उन्होंने कुल 34,200 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन व शिलान्यास किया। पीएम मोदी ने शिप बिल्डिंग सेक्टर के लिए 70 हजार करोड़ की तीन योजनाओं की घोषणा की है, और आगे उन्होंने कहना था कि भारत की अन्य देशों पर निर्भरता उसकी सबसे बड़ी कमजोरी रही है और इसे दूर करना अब प्राथमिकता है।
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भारत की शिपबिल्डिंग स्थिति और चुनौतियाँ
भारत के नौवहन क्षेत्र को दोषपूर्ण नीतियों के कारण हुए नुकसान का एक प्रमुख उदाहरण बताते हुए मोदी ने कहा कि भारत ऐतिहासिक रूप से एक बहुत ही जीवंत जहाज निर्माण उद्योग रहा है। उन्होंने कहा, “भारत के तटीय राज्यों में निर्मित जहाज कभी घरेलू और वैश्विक व्यापार को गति प्रदान करते थे। पचास साल पहले भी, भारत घरेलू स्तर पर निर्मित जहाजों का इस्तेमाल करता था, और उसका 40 प्रतिशत से ज्यादा आयात-निर्यात इन्हीं के जरिए होता था।”

मोदी ने कहा, “50 साल पहले तक हमारा व्यापार 40 प्रतिशत भारत में बने जहाजों से होता था, लेकिन अब यह घटकर मात्र पांच प्रतिशत रह गया है।” उन्होंने कहा कि भारत विदेशी नौवहन कंपनियों को उनकी सेवाओं के लिए हर साल 75 अरब अमेरिकी डॉलर या लगभग 6 लाख करोड़ रुपये का भुगतान करता है।
प्रधानमंत्री ने कहा, “क्या लोग कल्पना कर सकते हैं कि पिछले सात दशकों में दूसरे देशों को माल ढुलाई के रूप में कितना पैसा दिया गया है? धन के इस बहिर्वाह ने विदेश में लाखों नौकरियां पैदा की हैं। यदि इस व्यय का एक छोटा सा हिस्सा भी पिछली सरकारों ने घरेलू नौवहन उद्योग में लगाया होता, तो आज दुनिया भारतीय जहाजों का उपयोग कर रही होती, और भारत नौवहन सेवाओं से लाखों करोड़ रुपये कमा रहा होता।” मोदी ने कहा, “चिप (सेमीकंडक्टर चिप) या शिप (जहाज), हमें भारत में ही बनाने होंगे।” उन्होंने कहा कि घरेलू बंदरगाह वैश्विक समुद्री महाशक्ति के रूप में भारत के उदय की रीढ़ हैं।
मोदी ने बताया कि भारत जहाज निर्माण के मामले में दुनिया में 16वें स्थान पर है। वर्तमान में भारत में बने जहाजों की संख्या कुल जहाजों का सिर्फ 7% है। 50 साल पहले यह आंकड़ा लगभग 40% था।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत हर साल माल ढुलाई के लिए विदेशी शिपिंग कंपनियों को लगभग 6 लाख करोड़ रुपये (75 अरब डॉलर) का भुगतान करता है। उनका मानना है कि यदि इस निवेश का कुछ हिस्सा भारत में होता, तो देश आज वैश्विक शिपिंग इंडस्ट्री में अपनी पहचान बना चुका होता।
पीएम मोदी की तीन मेगा योजनाएँ
भारत की समुद्री शक्ति को मजबूत बनाने और शिपबिल्डिंग सेक्टर को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रधानमंत्री ने तीन योजनाओं की घोषणा की:
1. शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस स्कीम (25,000 करोड़ रुपये): इस योजना के तहत जहाज निर्माण कंपनियों को कम ब्याज दर पर ऋण मिलेगा और वित्तीय मदद की जाएगी।
2. मैरिटाइम डेवलपमेंट फंड (25,000 करोड़ रुपये): यह फंड उद्योग के लोगों को दीर्घकालिक वित्तीय सुरक्षा देगा और कारोबार में स्थिरता लाएगा।
3. ग्रीनफील्ड शिपबिल्डिंग मेगा क्लस्टर्स (20,000 करोड़ रुपये): नए शिपबिल्डिंग क्लस्टर्स, बंदरगाह विस्तार और बेहतर कनेक्टिविटी के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

‘एक राष्ट्र, एक दस्तावेज’ और ‘एक राष्ट्र, एक बंदरगाह’
प्रधानमंत्री ने बताया कि अब देश के सभी प्रमुख बंदरगाह सरल और एकीकृत प्रक्रिया के तहत काम करेंगे। इस पहल के तहत ‘एक राष्ट्र, एक दस्तावेज’ और ‘एक राष्ट्र, एक बंदरगाह’ लागू किए गए हैं, जिससे व्यापार और नौवहन में समय की बचत होगी। साथ ही, समुद्री क्षेत्र में सुधार के लिए पांच नए कानून भी पेश किए गए हैं।
जहाजों को बुनियादी ढांचे का दर्जा
प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि अब बड़े जहाजों को बुनियादी ढांचे का दर्जा दिया गया है। इससे जहाज निर्माण कंपनियों को बैंकों से ऋण लेना आसान होगा और उन्हें बुनियादी ढांचे से जुड़ी सभी सुविधाएँ मिलेंगी।
भविष्य और भारत की समुद्री शक्ति
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के मुकाबले भारत को खड़ा करने के लिए यह कदम ऐतिहासिक है। इन योजनाओं से न केवल रोजगार के बड़े अवसर पैदा होंगे, बल्कि भारत की वैश्विक समुद्री शक्ति के रूप में पहचान भी मजबूत होगी।
कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद इन योजनाओं का जल्दी क्रियान्वयन होगा। इस पहल से भारत की नौवहन क्षमता मजबूत होगी और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने में मदद मिलेगी।









