रूस बनाम फ्रांस: भारत की लड़ाकू विमानों की जरूरतों के लिए कौन सा ऑफर है बेहतर? Su-57E बनाम राफेल F4

रूस बनाम फ्रांस और भारत: भारत की रक्षा क्षमता को और मज़बूत बनाने और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को आगे बढ़ाने के लिए अब भारतीय वायु सेना (IAF) के सामने एक अहम फैसला है। रूस और फ्रांस, दोनों देशों ने भारत को अपने-अपने लड़ाकू विमानों का आकर्षक प्रस्ताव दिया है। रूस अपनी Su-57E स्टील्थ जेट डील लेकर आया है, वहीं फ्रांस ने राफेल F4 और साफ्रान इंजन पैकेज की पेशकश की है। यह निर्णय सिर्फ आज की ज़रूरतें पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि आने वाले दशकों में भारत की रणनीतिक दिशा तय करने वाला होगा।

रूस बनाम फ्रांस
रूस बनाम फ्रांस

 

रूस का Su-57E: कम दाम और ज्यादा संख्या का वादा

रूस ने भारत को अपनी पांचवीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान Su-57E देने का ऑफर किया है।

  • कम लागत में ज्यादा विमान: रूस 126 विमानों की पेशकश कर रहा है। एक विमान की अनुमानित कीमत लगभग 670 करोड़ रुपये है। इसके मुकाबले फ्रांसीसी राफेल F4 की कीमत करीब 1000 करोड़ रुपये प्रति विमान है। यानी समान बजट में भारत को ज्यादा संख्या मिल सकती है।
  • तकनीकी ट्रांसफर और लोकलाइजेशन: रूस ने 70-80% तक स्थानीय उत्पादन (HAL, नासिक में) और पूरा सोर्स कोड ट्रांसफर का वादा किया है। भारत अपने हथियार जैसे अस्त्र मिसाइल और रुद्रम इसमें फिट कर सकेगा।
  • परिचित प्लेटफॉर्म: Su-57, भारत के मौजूदा Su-30MKI बेड़े से काफी हद तक मेल खाता है। ट्रेनिंग और रखरखाव के लिहाज़ से यह फायदा पहुंचा सकता है।

कमज़ोरियाँ:

हालाँकि, Su-57 की स्टील्थ क्षमता अमेरिकी F-35 जैसी नहीं मानी जाती। इसकी रडार क्रॉस सेक्शन (RCS) कहीं ज़्यादा है। इसके अलावा, इसका इंजन अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस की सप्लाई और डिलीवरी क्षमता पर भी सवाल उठते हैं।

 

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फ्रांस का राफेल F4 और इंजन पैकेज: भरोसेमंद और भविष्य की सोच

फ्रांस का ऑफर सिर्फ लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राफेल F4 और साफ्रान कंपनी का इंजन सौदा भी शामिल है।

  • सिद्ध और भरोसेमंद विमान: राफेल पहले से ही भारतीय वायु सेना में शामिल है। पायलट और तकनीकी स्टाफ इसके ऑपरेशन से परिचित हैं। इसका नया वर्ज़न F4 और भी आधुनिक तकनीक और बेहतर हथियार क्षमता लाता है।
  • तेजस Mk-2 के लिए इंजन सौदा: फ्रांस की साफ्रान कंपनी भारत को M88-4 इंजन देने को तैयार है। यह स्वदेशी तेजस Mk-2 कार्यक्रम के लिए अमेरिकी GE F414 का विकल्प बन सकता है। इससे भारत को इंजन तकनीक में आत्मनिर्भरता मिलेगी।
  • विश्वसनीय साझेदारी: फ्रांस अब तक अपनी डिलीवरी और तकनीकी सहयोग में भरोसेमंद साबित हुआ है। इसके साथ साझेदारी भारत की रक्षा इंडस्ट्री के लिए लंबे समय तक फायदेमंद होगी।

कमज़ोरियाँ:

राफेल की सबसे बड़ी चुनौती इसकी कीमत है। यह Su-57E की तुलना में काफी महंगा है। साथ ही, फ्रांस के साथ निर्यात को लेकर कुछ शर्तें हो सकती हैं जो भारत की स्वतंत्रता को सीमित करेंगी।

 

भारत के सामने दुविधा: संख्या बनाम गुणवत्ता

भारत के सामने मूल सवाल यह है कि उसे ज्यादा संख्या में विमान चाहिए या फिर कम संख्या में मगर भरोसेमंद और पहले से परखे हुए विमान चाहिए।

  • रूस का Su-57E पैकेज आकर्षक है क्योंकि कम दाम में ज्यादा संख्या मिल सकती है और तकनीकी ट्रांसफर भी ज़्यादा होगा।
  • फ्रांस का राफेल F4 + इंजन पैकेज महंगा है, लेकिन यह भारत के भविष्य और स्वदेशी तेजस Mk-2 कार्यक्रम के लिए गेम चेंजर हो सकता है।

निष्कर्ष: किसे चुने भारत?

अगर भारत की प्राथमिकता तुरंत बड़ी संख्या में विमान हासिल करने की है, तो रूस का Su-57E सौदा सस्ता और उपयोगी साबित हो सकता है। लेकिन इसके साथ जोखिम भी जुड़ा है – जैसे तकनीकी परिपक्वता की कमी और रूस-यूक्रेन संघर्ष के चलते सप्लाई पर अनिश्चितता।

दूसरी ओर, फ्रांस का ऑफर कम संख्या में विमान देता है, मगर उसकी सबसे बड़ी ताकत है विश्वसनीयता और इंजन तकनीक। यह न केवल IAF को एक भरोसेमंद विमान देगा बल्कि भारत के स्वदेशी विमान कार्यक्रम को भी मज़बूत करेगा।

इसलिए, दीर्घकालिक नज़रिए से देखें तो राफेल F4 और साफ्रान इंजन पैकेज भारत के लिए ज्यादा फायदेमंद विकल्प प्रतीत होता है। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम साबित हो सकता है।

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