हिंदी आवाज़ ब्यूरो
लखनऊ, 06 अक्टूबर 2025
एक जमाना था जब त्योहारों की खुशियाँ नई सोने की ज्वेलरी खरीदने से ही पूरी होती थीं। लेकिन अब वक्त बदल गया है। सोने की कीमत में लगातार बढ़ोतरी होने इसे आम आदमी की पहुँच से बाहर का सामान बना दिया है। इसका सीधा असर दशहरा जैसे शुभ मौके पर भी देखने को मिला, जहाँ सोने की बिक्री में 25% तक की गिरावट दर्ज की गई। उद्योग जगत के अनुसार, इस बार दशहरे पर सिर्फ 18 टन सोना ही बिक पाया, जबकि पिछले साल यह आँकड़ा 24 टन था।

क्यों आई इतनी भारी गिरावट? सोने की कीमत है बड़ी वजह
आंकड़ों पर नजर डालें तो इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह सोने की कीमत में लगातार बढ़ोतरी को माना जा रहा है। दशहरे के दिन सोने का रिटेल भाव 1.16 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुँच गया था। हैरान कर देने वाली बात यह है कि सिर्फ एक साल पहले, 2024 के दशहरे पर, कीमत 78,000 रुपये प्रति 10 ग्राम थी। यानी, एक साल में सोना 48% महंगा हो गया। इसके ऊपर 3% GST और ज्वेलरी बनाने का 15% से 30% तक का मेकिंग चार्ज जुड़ जाता है। ऐसे में एक छोटा-सा गहना भी मध्यम वर्ग की जेब पर भारी पड़ रहा है।
पिछले दशहरे vs इस दशहरे
पिछले साल के दशहरे और आज के दशहरे में सोने को लेकर नजरिया पूरी तरह बदल गया है। 2024 में जहाँ 78,000 रुपये प्रति 10 ग्राम पर लोग नई ज्वेलरी खरीद रहे थे, वहीं सोने की कीमत में लगातार बढ़ोतरी के कारण 2025 में 1.16 लाख रुपये के भाव ने खरीदारी का फैसला ही बदल दिया। अब ‘निवेश’ और ‘एक्सचेंज’ पहली पसंद बन गए हैं, जबकि नकद ज्वेलरी खरीदारी पीछे छूट रही है। यह बदलाव साबित कर रहा है कि सोना अब आम आदमी की रोजमर्रा की खरीदारी नहीं, बल्कि एक Long-Term Investment बन चुका है।
खरीदारी का तरीका: ‘नया सोना’ से ‘पुराने की अदला-बदली’ का सफर
- तब (2024): एक्सचेंज का ऑप्शन था, लेकिन ज्यादातर लोग नकद या EMI पर नई खरीदारी को प्राथमिकता दे रहे थे।
- अब (2025): एक्सचेंज मेन स्ट्रीम बन गया है। ज्वेलर्स के मुताबिक, 50-60% सेल अब पुराने गहनों को बदलवाने से आ रही है। लोग नया सोना खरीदने के बजाय अपनी पुरानी ज्वेलरी को अपग्रेड करना ज्यादा समझदारी मान रहे हैं।
प्रोडक्ट का चुनाव: ‘ज्वेलरी’ से ‘सिक्के और बार’ का सफर
- तब (2024): खरीदारी का मतलब ज्वेलरी ही था – चेन, झुमके, ब्रेसलेट।
- अब (2025): निवेश के मकसद से सोने-चांदी के सिक्के और छोटे बार (5 ग्राम, 10 ग्राम) की मांग तेजी से बढ़ी है। दक्षिण भारत में तो शादियों में भी ज्वेलरी के बजाय सोने के बार देने का ट्रेंड चल निकला है।

क्या कर रहे हैं ग्राहक? ‘एक्सचेंज’ और ‘इन्वेस्टमेंट’ का ट्रेंड चला
अब सवाल उठता है कि जब नई ज्वेलरी नहीं खरीदी जा रही, तो लोग शादियों और त्योहारों के लिए गहने कैसे बनवा रहे हैं? जवाब है ‘पुराने सोने की अदला-बदली’ का बढ़ता ट्रेंड। ज्वेलर्स के मुताबिक, इस दशहरे पर लगभग 50-55% सेल पुराने गहनों को एक्सचेंज करके नए बनवाने से आई है। लोग नकद में नया सोना खरीदने के बजाय, अपने पुराने गहने बदलवा रहे हैं। इससे उन पर कीमत का इतना ज्यादा बोझ नहीं पड़ता।
दूसरा बड़ा बदलाव यह देखने को मिल रहा है कि लोग सोना अब ज्वेलरी के लिए कम और निवेश के लिए ज्यादा खरीद रहे हैं। सोने-चाँदी के सिक्कों और छड़ों (Bars) की माँग में इजाफा हुआ है। खासकर 5 ग्राम के सोने के सिक्के और 20 ग्राम के चाँदी के सिक्के निवेशकों में बहुत पसंद किए जा रहे हैं। दक्षिण भारत में तो अब शादियों में दहेज के तौर पर ज्वेलरी की जगह 10 से 20 ग्राम की सोने की छड़ें दी जा रही हैं।
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क्या सोना अब आम आदमी की पहुँच से बाहर?
यह सवाल अब मन में उठना लाजमी है। पिछले एक साल में सोना 80,000 रुपये से छलांग लगाकर 1.16 लाख रुपये के स्तर पर पहुँच गया है। ऐसे में मध्यम वर्ग का परिवार अब बिना सोचे-समझे सोने के गहने नहीं खरीद सकता। सोना अब एक ‘लक्ज़री आइटम’ बनता जा रहा है, जिसे खरीदने के लिए लोगों को महीनों पहले से प्लानिंग करनी पड़ रही है या फिर लोन लेना पड़ रहा है।

भविष्य क्या कहता है?
हालाँकि, एक उम्मीद की किरण भी दिख रही है। इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के सचिव सुरेंद्र मेहता का कहना है कि अब ग्राहकों ने यह मान लिया है कि सोना इन स्तरों से जल्दी नीचे नहीं आने वाला। इसलिए वे आगामी धनतेरस, दिवाली और शादी के सीजन के लिए ऑर्डर देने लगे हैं। ऐसा लगता है कि बढ़ती कीमतों के साथ समझौता करके, लोग अब ‘जरूरत के मुताबिक’ और ‘समझदारी’ से सोना खरीदने लगे हैं।
निष्कर्ष:
साफ हैकि सोने की चमक अब भी बरकरार है, लेकिन इसके खरीदने के तरीके बदल गए हैं। ‘निवेश का सोना’ और ‘पुराने सोने की अदला-बदली’ ये दोनों ट्रेंड आने वाले समय में और मजबूत होने वाले हैं। जब तक कीमतें इस स्तर पर बनी रहेंगी, आम आदमी के लिए नकद में नई ज्वेलरी की खरीदारी एक सपना बनी रहेगी।
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