एक साधारण मोहनदास से ‘महात्मा’ तक का सफर:
महात्मा गांधी: मोहनदास करमचंद गांधी। यह नाम सुनते ही दिमाग में एक धोती-लाठी वाली छवि उभरती है, जो अहिंसा और सत्य का प्रतीक बन गई। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह ‘महात्मा’ बनने की यात्रा कितनी कठिन और विवादों से भरी थी? गांधी जी सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे; वह एक विचार, एक क्रांति और एक जटिल व्यक्तित्व के धनी थे। इस लेख में हम उनके जीवन के उन पहलुओं को उजागर करेंगे, जो अक्सर चर्चा से दूर रह जाते हैं, साथ ही उनके डॉ. अंबेडकर के साथ मतभेद और गोलमेज सम्मेलन में उनकी भूमिका को भी समझेंगे।

कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
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पूरा नाम: मोहनदास करमचंद गांधी
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जन्म: 2 अक्टूबर 1869, पोरबंदर, गुजरात
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मृत्यु: 30 जनवरी 1948 (नई दिल्ली में नाथूराम गोडसे द्वारा हत्या)
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प्रमुख उपाधि: राष्ट्रपिता
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दर्शन: सत्य और अहिंसा
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प्रमुख आंदोलन: दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष, असहयोग आंदोलन, दांडी यात्रा (नमक सत्याग्रह), भारत छोड़ो आंदोलन।
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मुख्य लक्ष्य एवं उपलब्धि: ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता (1947) प्राप्त करना।
यह जानकारी गांधी जी के जीवन का एक संपूर्ण और सही विवरण प्रस्तुत करती है।
दक्षिण अफ्रीका का संघर्ष: अहिंसक युद्ध की नींव
गांधीजी का राजनीतिक और सामाजिक सफर भारत में नहीं, बल्कि दक्षिण अफ्रीका में शुरू हुआ। एक युवा वकील के तौर पर जब वह वहाँ गए, तो उनके साथ हुए नस्लीय भेदभाव (जैसे कि ट्रेन की फर्स्ट क्लास कोच से बाहर फेंका जाना) ने उनमें संघर्ष की अलख जगाई। उन्होंने वहाँ ‘सत्याग्रह’ का पहला सफल प्रयोग किया – यह कोई विरोध नहीं, बल्कि सत्य के प्रति आग्रह और अहिंसक असहयोग का दर्शन था। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने भारतीय समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी और यहीं से ‘महात्मा’ के रूप में उनकी पहचान बननी शुरू हुई।
गोलमेज सम्मेलन: एक महत्वपूर्ण मोड़ और गांधीजी की भूमिका
भारत के संवैधानिक ढाँचे पर चर्चा के लिए लंदन में 1930-32 के बीच तीन गोलमेज सम्मेलन आयोजित किए गए। दूसरे गोलमेज सम्मेलन (1931) में गांधीजी कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। यह घटना बेहद महत्वपूर्ण थी क्योंकि गांधीजी ने औपचारिक रूप से ब्रिटिश सरकार के सामने भारत की आजादी की माँग रखी।

हालाँकि, यह सम्मेलन कई कारणों से विफल रहा:
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सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा: डॉ. अंबेडकर ने दलितों के लिए अलग निर्वाचन मतदाताओं (Separate Electorates) की माँग रखी, जबकि गांधीजी इसके सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि इससे देश की एकता टूटेगी और हिंदू समाज और भी बंट जाएगा।
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मुस्लिम लीग और अन्य समूहों की अपनी माँगें: अन्य समुदायों के भी अलग-अलग दावे थे, जिससे कोई सर्वसम्मति नहीं बन पाई।
गांधीजी इस सम्मेलन से खाली हाथ लौटे, लेकिन इसने उन्हें यह अहसास दिलाया कि भारत की आजादी की लड़ाई के सामने साम्प्रदायिक मसले एक बड़ी चुनौती हैं।
भारत की आजादी की लड़ाई: चार बड़े आंदोलन जिन्होंने हिला दी ब्रिटिश सत्ता की जड़ें
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असहयोग आंदोलन (1920-22): गांधीजी ने कहा कि अंग्रेजों का सहयोग करना हमारी गुलामी का सबसे बड़ा कारण है। उन्होंने देशवासियों से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने, सरकारी स्कूलों-नौकरियों का त्याग करने और खादी पहनने का आह्वान किया। यह आंदोलन जन-जन तक पहुँचा और गांधीजी को एक जननायक बना दिया।
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नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च) (1930): यह गांधीजी की सबसे रचनात्मक और प्रतीकात्मक योजनाओं में से एक थी। नमक पर लगे कर को अन्यायपूर्ण बताते हुए, उन्होंने 240 मील की पैदल यात्रा कर स्वयं नमक बनाकर कानून तोड़ा। इस सविनय अवज्ञा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रिटिश सरकार को शर्मसार किया।
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भारत छोड़ो आंदोलन (1942): द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, ‘करो या मरो’ के नारे के साथ शुरू हुए इस आंदोलन ने अंग्रेजों के खिलाफ एक अंतिम और निर्णायक जन-उभार पैदा किया। इसने स्पष्ट कर दिया कि अब भारत की जनता और कोई समझौता नहीं चाहती।
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स्वदेशी और खादी का संदेश: गांधीजी के लिए आजादी सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी थी। उन्होंने स्वदेशी अपनाने और खादी पहनने पर जोर दिया, ताकि देश के गाँव आत्मनिर्भर बन सकें और ब्रिटिश उद्योगों को झटका लगे।

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विरोधाभास और आलोचनाएँ: गांधी जिन्हें हर कोई नहीं समझ पाया
हर महान व्यक्तित्व की तरह, गांधीजी भी आलोचनाओं से अछूते नहीं थे। उनके कुछ फैसले और विचार आज भी बहस का कारण बनते हैं:
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डॉ. अंबेडकर के साथ मतभेद और पूना पैक्ट: गांधीजी छुआछूत के खिलाफ थे और उन्होंने ‘हरिजन’ (ईश्वर की संतान) शब्द का प्रयोग करके दलितों को सम्मान देना चाहा। हालाँकि, डॉ. भीमराव अंबेडकर मानते थे कि गांधीजी का यह दृष्टिकोण दयाभाव और सुधारवादी था, न कि समान राजनीतिक अधिकारों पर आधारित। अंबेडकर चाहते थे कि दलितों के लिए अलग निर्वाचन मतदाताओं का प्रावधान हो, ताकि वे अपने स्वयं के प्रतिनिधि चुन सकें।
इस मुद्दे पर गोलमेज सम्मेलन में कोई हल नहीं निकला। बाद में, 1932 में ब्रिटिश सरकार ने अंबेडकर की माँग मानते हुए ‘कम्युनल अवार्ड’ की घोषणा की। इसके विरोध में गांधीजी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। इसके बाद ही पूना पैक्ट समझौता हुआ, जिसमें अलग निर्वाचन मतदाताओं की जगह दलितों के लिए संयुक्त निर्वाचन में आरक्षित सीटों का प्रावधान किया गया। यह घटना गांधी और अंबेडकर के बीच मौलिक विचारधारात्मक अंतर को दर्शाती है।
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हिंदू-मुस्लिम एकता का सपना: गांधीजी हिंदू-मुस्लिम एकता के पक्षधर थे। लेकिन देश के बँटवारे और सांप्रदायिक हिंसा ने उनके इस सपने को ठेस पहुँचाई। कट्टरपंथी हिंदू संगठन उन्हें मुसलमानों के पक्ष में झुकाव रखने वाला मानते थे, जबकि कुछ मुस्लिम नेता उन्हें सच्चा हिंदू नेता मानते थे।
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नाथूराम गोडसे और हत्या का कारण: 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधीजी की हत्या कर दी। गोडसे एक हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े थे। उनका मानना था कि गांधीजी का मुसलमानों के प्रति ‘अत्यधिक’ झुकाव और बँटवारे के दौरान पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने का समर्थन करना, देश के हित में नहीं था। यह घटना दर्शाती है कि उनके अपने ही देश में कुछ लोगों के लिए उनके विचार अस्वीकार्य थे।

निष्कर्ष: गांधी की विरासत आज भी प्रासंगिक क्यों है?
आज के दौर में, जब हिंसा और घृणा की खबरें आम हैं, गांधीजी का अहिंसा, सत्य और सादगी का दर्शन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। वह सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि एक सामाजिक प्रयोगकर्ता थे। गोलमेज सम्मेलन में उनकी भागीदारी और डॉ. अंबेडकर के साथ उनके जटिल संबंध दिखाते हैं कि स्वतंत्रता का मार्ग कितना चुनौतीपूर्ण था। उनके विरोधाभास और आलोचनाएँ उन्हें और भी मानवीय बनाते हैं। वह एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने जीवन को ही अपना संदेश बना दिया। उनकी शिक्षाएँ – पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय अर्थव्यवस्था, और शांतिपूर्ण विरोध – आज भी दुनिया भर के लोगों को प्रेरित करती हैं। गांधीजी को समझने का मतलब है, सिर्फ इतिहास के पन्नों को पलटना नहीं, बल्कि एक बेहतर मानवता और बेहतर भारत के सपने को फिर से जीना है।









