भारत में हर चुनाव के बाद एक बहस जरूर छिड़ जाती है: क्या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) विश्वसनीय है? विपक्षी दल अक्सर इसमें हेरा-फेरी के आरोप लगाते हैं, तो सत्तापक्ष और चुनाव आयोग इसकी सुरक्षा और दक्षता का दावा करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह मशीन आई कहां से? दुनिया में सबसे पहले इसका इस्तेमाल किस देश ने किया और आज वहां इसकी क्या स्थिति है? यह लेख ईवीएम के पूरे सफर पर विस्तृत प्रकाश डालता है।

ईवीएम (EVM) क्या है?
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है जिसका उपयोग मतदाताओं द्वारा वोट डालने और उन वोटों को गिनने के लिए किया जाता है। यह पारंपरिक बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स का एक डिजिटल विकल्प है। एक ईवीएम में मुख्य रूप से दो यूनिट होती हैं:
-
कंट्रोल यूनिट: यह मतदान अधिकारी (पोलिंग ऑफिसर) के पास रहती है। इसी यूनिट से मशीन को ऑन/ऑफ किया जाता है और मतदान शुरू करने का निर्देश दिया जाता है।
-
बैलटिंग यूनिट: यह यूनिट वोटिंग कंपार्टमेंट के अंदर रखी जाती है, जहाँ मतदाता बटन दबाकर अपना वोट डालते हैं। इस पर उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिह्न होते हैं।

इन दोनों यूनिट्स को एक लंबे केबल से जोड़ा जाता है। ईवीएम की खासियत यह है कि यह बैटरी से चलती है, इसलिए बिजली न होने पर भी मतदान प्रक्रिया प्रभावित नहीं होती।
दुनिया में पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल कहाँ हुआ?
एक आम धारणा यह है कि भारत ईवीएम का अग्रदूत है, लेकिन ऐसा नहीं है। दुनिया में सबसे पहले इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का इस्तेमाल संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) में हुआ था।
1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में, अमेरिका के कुछ राज्यों ने मतदान प्रक्रिया को तेज, अधिक सटीक और सुविधाजनक बनाने के लिए इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर प्रयोग शुरू किए। इन्हीं प्रयोगों ने आधुनिक ईवीएम की नींव रखी।
अमेरिका में ईवीएम का सफर: शुरुआत से लेकर आज तक
शुरुआती दौर (1960-1970):
अमेरिका में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग का पहला प्रयोग 1964 में ‘ऑटोमैटिक वोटिंग मशीन’ (AVM) के रूप में हुआ। इसके बाद, 1970 के दशक में ‘डायरेक्ट रिकॉर्डिंग इलेक्ट्रॉनिक’ (DRE) मशीनों का इस्तेमाल शुरू हुआ। इन मशीनों में मतदाता बटन दबाकर या टचस्क्रीन के जरिए सीधे अपना वोट दर्ज करते थे।
व्यापक अपनाने का दौर (1980):
1980 के दशक तक, अमेरिका के कई राज्यों ने मतदान में तेजी और सुविधा लाने के लिए इन इलेक्ट्रॉनिक मशीनों को अपना लिया था। यह माना जा रहा था कि यह तकनीक मानवीय त्रुटियों को खत्म करके चुनाव प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाएगी।
विवाद और बदलाव का दौर (2000 का चुनाव):
अमेरिका में ईवीएम के मॉडल पर सबसे बड़ा सवाल 2000 के राष्ट्रपति चुनाव में उठा। फ्लोरिडा राज्य में हुए भीषण मतगणना विवाद, जहाँ ‘पंच कार्ड’ बैलेट और ‘हैंगिंग चैड’ की समस्या ने परिणामों को हफ्तों तक अटकाए रखा, ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। इस घटना के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सिस्टम को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे। सुरक्षा, पारदर्शिता और हैकिंग के खतरों को लेकर चिंता जताई जाने लगी।
वर्तमान स्थिति: हाइब्रिड मॉडल की ओर झुकाव
इन चिंताओं के चलते, अमेरिका आज पूरी तरह से ईवीएम पर निर्भर नहीं है। अधिकांश राज्यों ने एक ‘हाइब्रिड सिस्टम’ यानी मिश्रित प्रणाली अपना ली है। इस प्रणाली के तहत:
-
वोट इलेक्ट्रॉनिक मशीन से दर्ज किए जाते हैं।
-
लेकिन साथ ही, मशीन एक ‘वोटर-वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल’ (VVPAT) की तरह एक पेपर स्लिप भी छापती है, जिसे मतदाता एक पारदर्शी बॉक्स में देख सकता है (लेकिन निकाल नहीं सकता)।

-
इस पेपर रिकॉर्ड को भविष्य में किसी भी विवाद या मतगणना की पुष्टि के लिए सुरक्षित रखा जाता है।
2024 तक, अमेरिका में लगभग 70% वोटिंग मशीनें इसी इलेक्ट्रॉनिक-पेपर हाइब्रिड मॉडल पर आधारित हैं, जबकि कुछ राज्य अब भी केवल पारंपरिक पेपर बैलेट का ही उपयोग करते हैं। अमेरिका, जिसने ईवीएम की शुरुआत की, आज सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए पेपर बैकअप को अनिवार्य मानता है।
भारत में ईवीएम की शुरुआत और विकास
भारत में ईवीएम (EVM) की यात्रा-
-
पहला प्रयोग (1982): भारत में पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल 1982 में केरल के पारावुर (पारुर) विधानसभा क्षेत्र के 50 मतदान केंद्रों पर हुआ था। यह एक परीक्षण था।

-
कानूनी मान्यता (1989): भारतीय संसद ने जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन करके ईवीएम के उपयोग को कानूनी मान्यता दी।
-
व्यापक पैमाने पर उपयोग (1998): 1998 के विधानसभा चुनावों में ईवीएम का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया गया।
-
पूर्ण रूप से अपनाना (2004): 2004 के आम चुनावों से भारत ने पूरी तरह से ईवीएम पर स्विच कर दिया और तब से सभी चुनाव इसी के जरिए कराए जा रहे हैं।
-
VVPAT का परिचय (2013): भारत ने भी पारदर्शिता बढ़ाने के लिए 2013 में VVPAT (Voter Verifiable Paper Audit Trail) सिस्टम को शुरू किया, जो ईवीएम से जुड़कर मतदाता को उसके वोट की एक पेपर स्लिप दिखाता है।
इसको भी देखें –
Trading क्या है? समझें पूरी प्रक्रिया, फायदे और शुरुआत करने का सही तरीका 2025
SIP क्या है? आसान भाषा में जानें SIP प्लान की पूरी जानकारी और फायदे
भारत की EVM: दुनिया की सबसे अनोखी और सुरक्षित मतदान प्रणाली
जब दुनिया भर में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग सिस्टम पर विवाद और चिंताएँ बनी हुई हैं, भारत की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) एक अनोखी और अद्वितीय प्रणाली के रूप में उभरी है। यह केवल एक वोटिंग मशीन नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक है। आइए जानते हैं कि भारत की ईवीएम दुनिया की अन्य वोटिंग प्रणालियों से कैसे अलग और अनूठी है।
1. स्टैंडअलोन डिवाइस: इंटरनेट या नेटवर्क से कनेक्टिविटी नहीं
भारत की ईवीएम की सबसे बड़ी खासियत है कि यह एक पूरी तरह से स्टैंडअलोन डिवाइस है। इसका मतलब है:
-
नो इंटरनेट कनेक्शन: ईवीएम किसी भी प्रकार के इंटरनेट, ब्लूटूथ, वाई-फाई या अन्य वायरलेस नेटवर्क से कनेक्ट नहीं होती।
-
नो एक्सटर्नल कनेक्शन: मशीन को केवल एक केबल के जरिए कंट्रोल यूनिट से जोड़ा जाता है। इसके अलावा इसका बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं होता।
-
हैकिंग असंभव: इंटरनेट या किसी नेटवर्क से न जुड़ी होने के कारण, रिमोट हैकिंग की संभावना पूरी तरह से शून्य है। हैकिंग के लिए हैकर को भौतिक रूप से हजारों-लाखों मशीनों तक पहुँचना होगा, जो असंभव है।
यह विशेषता भारत की ईवीएम को अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में इस्तेमाल होने वाली नेटवर्क-आधारित वोटिंग मशीनों से पूरी तरह अलग करती है, जहाँ साइबर हैकिं का खतरा एक बड़ी चिंता का विषय है।
2. वन-टाइम प्रोग्रामेबल माइक्रोचिप: सॉफ्टवेयर को बदलना असंभव
भारत की ईवीएम (EVM) में एक विशेष प्रकार की माइक्रोचिप का उपयोग किया जाता है:

-
वन-टाइम प्रोग्रामेबल (OTP): इस चिप को केवल एक बार प्रोग्राम किया जा सकता है। एक बार प्रोग्राम हो जाने के बाद, इसमें कोई भी बदलाव या री-प्रोग्रामिंग करना तकनीकी रूप से असंभव है।
-
नो ऑपरेटिंग सिस्टम: ईवीएम में विंडोज, लिनक्स या एंड्रॉयड जैसा कोई सामान्य ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं होता। इसमें एक फिक्स्ड, कस्टमाइज्ड सॉफ्टवेयर होता है जिसे बदला नहीं जा सकता।
-
मैलवेयर से सुरक्षित: चूंकि सॉफ्टवेयर को बदला नहीं जा सकता, इसलिए इसमें मैलवेयर या वायरस घुसाने की कोई गुंजाइश नहीं है।
3. पूर्ण पारदर्शिता के लिए VVPAT सिस्टम
भारत ने ईवीएम की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए एक अनूठा वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (VVPAT) सिस्टम विकसित किया है:
-
तुरंत रसीद: जैसे ही मतदाता ईवीएम पर बटन दबाता है, VVPAT मशीन एक पेपर स्लिप छापती है जिस पर उम्मीदवार का नाम, चुनाव चिह्न और क्रम संख्या छपी होती है।
-
7 सेकंड का प्रदर्शन: यह स्लिप एक पारदर्शी डिस्प्ले बॉक्स में 7 सेकंड के लिए दिखाई देती है, जिससे मतदाता को अपने वोट की पुष्टि करने का मौका मिलता है।
-
भौतिक सबूत: इस पेपर रिकॉर्ड को भविष्य में किसी भी विवाद की स्थिति में मतगणना के लिए सुरक्षित रखा जाता है।
यह दोहरी जाँच प्रणाली (ईवीएम + VVPAT) भारत की चुनाव प्रक्रिया को दुनिया में सबसे अधिक पारदर्शी बनाती है।
4. बहुस्तरीय सुरक्षा और पारदर्शिता
भारत की ईवीएम प्रणाली में कई स्तरों पर सुरक्षा सुनिश्चित की गई है:
-
फिजिकल सिक्योरिटी: मशीनों को हमेशा सीलबंद रखा जाता है और उन पर अंकित सीरियल नंबरों की मैचिंग करके ही उनका इस्तेमाल किया जाता है।
-
मॉक पोल: चुनाव से पहले, सभी राजनीतिक दलों की मौजूदगी में मशीनों का रैंडम टेस्टिंग (मॉक पोल) किया जाता है ताकि यह साबित हो सके कि वे सही ढंग से काम कर रही हैं।
-
पोस्ट-इलेक्शन ऑडिट: चुनाव के बाद, बेतरतीब ढंग से चुने गए 5% मतदान केंद्रों पर VVPAT स्लिप की गिनती करके ईवीएम के परिणामों से मिलान किया जाता है। अब तक, इस मिलान में 99.99% से अधिक की सटीकता पाई गई है।

5. भारतीय संदर्भ के अनुकूल डिजाइन
भारत की ईवीएम को विशेष रूप से भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है:
-
बैटरी बैकअप: बिजली की कमी वाले दूरदराज के इलाकों के लिए, मशीन बैटरी से चलती है।
-
पोर्टेबल और हल्की: मशीनें हल्की और पोर्टेबल हैं, जिससे उन्हें पहाड़ी और दुर्गम इलाकों तक ले जाना आसान है।
-
मल्टी-लिंगुअल सपोर्ट: ईवीएम पर उम्मीदवार का नाम और पार्टी का नाम क्षेत्रीय भाषाओं में भी दिखाया जा सकता है।
ईवीएम में नवीनतम अपडेट: बिहार चुनाव से पहले चुनाव आयोग की नई गाइडलाइन
चुनाव आयोग लगातार मतदान प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और मतदाता-अनुकूल बनाने के लिए नए सुधार लाता रहता है। हाल ही में, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले, आयोग ने ईवीएम के बैलेट पेपर (बैलटिंग यूनिट पर दिखने वाला डिस्प्ले) के लिए नई दिशा-निर्देश जारी किए हैं:
-
रंगीन फोटोग्राफ: अब से ईवीएम पर उम्मीदवारों की तस्वीरें रंगीन छापी जाएंगी। पहले ये तस्वीरें काले-सफेद हुआ करती थीं। इससे मतदाताओं को उम्मीदवार को पहचानने में काफी आसानी होगी, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ निरक्षरता की दर अधिक है।
-
बड़ी और स्पष्ट तस्वीर: नए निर्देशों के अनुसार, उम्मीदवार का चेहरा बैलेट पेपर पर दिखाए गए एरिया के तीन-चौथाई हिस्से में होगा। इससे तस्वीर और अधिक स्पष्ट और पहचानने योग्य होगी।
-
स्पष्ट सीरियल नंबर: क्रम संख्या (सीरियल नंबर) को भी और अधिक बोल्ड और स्पष्ट तरीके से प्रदर्शित किया जाएगा, ताकि मतदाता को सही उम्मीदवार का बटन दबाने में कोई भ्रम न हो।
इस नए प्रयोग की शुरुआत बिहार चुनाव से होगी और भविष्य में इसे देश के सभी चुनावों में लागू किया जाएगा। यह कदम मतदान प्रक्रिया में सुविधा और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है।
ईवीएम के फायदे और नुकसान
फायदे:
-
तेज मतगणना: परिणाम घोषित होने में लगने वाला समय काफी कम हो गया है।
-
कम लागत: बैलेट पेपर की छपाई, परिवहन और भंडारण का खर्च बचता है।
-
पर्यावरण अनुकूल: कागज के अत्यधिक उपयोग में कमी।
-
मानवीय त्रुटि में कमी: मतगणना में गलती की संभावना लगभग खत्म हो जाती है।
-
अमान्य वोटों में कमी: मतदाता सही बटन दबाकर ही वोट डाल सकता है, इसलिए अमान्य वोटों की संख्या शून्य के करीब होती है।
नुकसान/आलोचनाएँ:
-
हैकिंग का डर: सबसे बड़ी आलोचना यह है कि मशीन को हैक किया जा सकता है।
-
पारदर्शिता का अभाव: आम आदमी के लिए मशीन का सॉफ्टवेयर एक ‘ब्लैक बॉक्स’ की तरह है, जिसे समझना मुश्किल है।
-
तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता: मशीनों के रखरखाव और प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की जरूरत होती है।
-
ग्लिच की संभावना: किसी भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की तरह, इसमें भी तकनीकी खराबी आ सकती है।
निष्कर्ष: भविष्य की राह
भारत की ईवीएम (EVM) प्रणाली अपनी स्टैंडअलोन प्रकृति, वन-टाइम प्रोग्रामेबल चिप, VVPAT के माध्यम से पारदर्शिता और बहुस्तरीय सुरक्षा के कारण दुनिया की सबसे अनोखी और सुरक्षित मतदान प्रणालियों में से एक है। जहाँ दूसरे देश नेटवर्क-आधारित सिस्टम की सुरक्षा को लेकर जूझ रहे हैं, वहीं भारत ने एक ऐसी प्रणाली विकसित की है जो तकनीकी रूप से सुरक्षित होने के साथ-साथ भारतीय लोकतंत्र की जरूरतों के perfectly अनुकूल है। यह न केवल भारत के लिए, बल्कि दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों के लिए भी एक मॉडल प्रस्तुत करती है।
ईवीएम लोकतंत्र में तकनीक का एक महत्वपूर्ण integration है। अमेरिका के अनुभव ने दुनिया को यह सबक दिया है कि तकनीक के साथ-साथ पारदर्शिता और मतदाता के विश्वास का होना भी उतना ही जरूरी है। भारत ने VVPAT system लाकर और अब रंगीन फोटो जैसे सुधारों को अपनाकर इस दिशा में लगातार कदम बढ़ाए हैं। हालाँकि, विश्वास बनाए रखने के लिए निर्वाचन आयोग का लगातार मशीनों की सुरक्षा को upgrade करते रहना, राजनीतिक दलों को मशीनों के परीक्षण का मौका देना और जनता को इसकी कार्यप्रणाली के बारे में educate करना बेहद जरूरी है। ईवीएम का भविष्य पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक पर निर्भर नहीं, बल्कि एक ऐसी मजबूत और पारदर्शी hybrid system पर निर्भर करेगा जो technology और voter’s trust के बीच एक perfect balance स्थापित कर सके।









