ITER प्रोजेक्ट: आज हम बात करने जा रहे हैं दुनिया के सबसे महत्वाकांक्षी और जटिल वैज्ञानिक प्रोजेक्ट्स में से एक, ITER यानी इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर की। यह एक ऐसा प्रोजेक्ट है जिसका लक्ष्य पृथ्वी पर ही एक “छोटा सूरज” बनाना है। अगर यह सफल हो जाता है, तो यह न सिर्फ मानवता की ऊर्जा की सारी समस्याओं का हल होगा, बल्कि भविष्य के लिए स्वच्छ और असीमित ऊर्जा का स्रोत बनेगा।

चलिए, विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह ITER प्रोजेक्ट है क्या, इसकी क्या खासियतें हैं, और क्यों यह दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए एक सपने जैसा है।
ITER प्रोजेक्ट क्या है? एक साधारण परिभाषा
सरल शब्दों में कहें तो ITER एक विशालकाय प्रयोग है। यह फ्रांस के दक्षिण में स्थित प्रोवेंस की खूबसूरत पहाड़ियों के नीचे बनाई जा रही एक अद्भुत मशीन है। इसे “टोकामक” नामक डिजाइन पर बनाया जा रहा है, जो एक विशाल डोनट के आकार की मशीन है। इस मशीन का एक ही लक्ष्य है: नाभिकीय संलयन (Nuclear Fusion) की प्रक्रिया को नियंत्रित करना और उससे प्राप्त ऊर्जा को बिजली में बदलने का रास्ता खोजना।
नाभिकीय संलयन क्या है?
इसे समझने के लिए हमें सूरज को देखना होगा। सूरज और तारे अरबों सालों से लगातार चमक रहे हैं। उनकी इस ऊर्जा का स्रोत就是 नाभिकीय संलयन ही है। इस प्रक्रिया में दो हल्के परमाणु (जैसे हाइड्रोजन) अत्यधिक गर्मी और दबाव के कारण आपस में जुड़कर एक भारी परमाणु (जैसे हीलियम) बनाते हैं। इस प्रक्रिया में थोड़ा-सा द्रव्यमान ऊर्जा में बदल जाता है, और भारी मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है। यही वह प्रक्रिया है जिसे ITER पृथ्वी पर दोहराना चाहता है।
ITER प्रोजेक्ट क्यों इतना जरूरी है? ऊर्जा संकट का संभावित हल
दुनिया आज ऊर्जा संकट से जूझ रही है। जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोल, डीजल) खत्म हो रहे हैं और प्रदूषण फैला रहे हैं। ऐसे में ITER एक नई उम्मीद की किरण है। आइए जानते हैं क्यों:

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असीमित ईंधन: संलयन के लिए जिस ईंधन की जरूरत होती है, वह है हाइड्रोजन के दो आइसोटोप – ड्यूटीरियम और ट्रिटियम। ड्यूटीरियम समुद्र के पानी से आसानी से मिल जाता है और ट्रिटियम को रिएक्टर के अंदर ही पैदा किया जा सकता है। यानी, ईंधन की कोई कमी नहीं होगी।
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स्वच्छ ऊर्जा: नाभिकीय संलयन से कोई ग्रीनहाउस गैसें (जैसे CO2) नहीं निकलतीं, जो जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं। इससे वायु प्रदूषण नहीं होता।
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कम रेडियोधर्मी कचरा: मौजूदा परमाणु रिएक्टर (नाभिकीय विखंडन पर काम करते हैं) लंबे समय तक रेडियोधर्मी रहने वाला खतरनाक कचरा पैदा करते हैं। जबकि संलयन प्रक्रिया में पैदा होने वाला कचरा बहुत कम समय तक रेडियोधर्मी रहता है और उसका निपटाना comparatively आसान होता है।
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सुरक्षित प्रक्रिया: संलयन प्रक्रिया को बनाए रखने के लिए बहुत विशेष परिस्थितियों की जरूरत होती है। अगर रिएक्टर में कोई दिक्कत आती है, तो प्रक्रिया अपने आप रुक जाएगी। इसमें परमाणु रिएक्टरों जैसी दुर्घटना (जैसे चेरनोबिल या फुकुशिमा जैसी) का खतरा नहीं है।
ITER प्रोजेक्ट की खास बातें और वैश्विक सहयोग
ITER कोई एक देश का प्रोजेक्ट नहीं है। यह पूरी मानवता का सपना है, जिसे साकार करने के लिए दुनिया के 35 देश मिलकर काम कर रहे हैं। इनमें भारत, अमेरिका, रूस, चीन, जापान, दक्षि़ण कोरिया और यूरोपीय संघ के सदस्य देश शामिल हैं। यह विज्ञान, राजनीति और तकनीक का एक अद्भुत मेल है, जो दिखाता है कि बड़े लक्ष्यों के लिए दुनिया कैसे एकजुट हो सकती है।
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भारत की भूमिका:
भारत इस ITER प्रोजेक्ट में एक महत्वपूर्ण भागीदार है। भारत का काम ITER के लिए जरूरी कुछ बड़े हार्डवेयर कंपोनेंट्स बनाना और सप्लाई करना है। इनमें शामिल है:
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क्रायोस्टेट: यह दुनिया का सबसे बड़ा वैक्यूम चैंबर होगा, जो रिएक्टर के अति-ठंडे सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट्स को घेरेगा। भारत ने इसे बनाने और स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई है।
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वैक्यूम वेसल के हिस्से: रिएक्टर के मुख्य कक्ष के कई बड़े हिस्से भारत में ही बनाए गए हैं।
यह भारत के इंजीनियरिंग कौशल और वैज्ञानिक क्षमता को दुनिया के सामने प्रदर्शित करता है।
चुनौतियाँ और देरी: वादे और हकीकत का अंतर
कोई भी बड़ा सपना आसानी से पूरा नहीं होता। ITER प्रोजेक्ट भी इसका अपवाद नहीं है। इस प्रोजेक्ट को शुरू से ही कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:

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तकनीकी जटिलता: ITER दुनिया की सबसे जटिल मशीनों में से एक है। इसमें लाखों पुर्जे हैं और हर एक पुर्जा अत्याधुनिक तकनीक से बना है। इन सबको एक साथ जोड़ना और सही तरीके से काम करवाना एक बहुत बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती है।
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लागत और देरी: प्रोजेक्ट की शुरुआत में इसके बजट और समयसीमा का अनुमान कम लगाया गया था। तकनीकी मुश्किलों और फंडिंग के मुद्दों के कारण इसकी लागत बढ़ती गई और समयसीमा बढ़ती गई। यह मूल रूप से 2018 तक शुरू होना था, लेकिन अब उम्मीद है कि 2026 तक इसका निर्माण पूरा हो जाएगा और 2035 तक पहला प्लाज़्मा प्रयोग शुरू होगा।
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अंतर्राष्ट्रीय समन्वय: इतने सारे देशों का एक साथ काम करना आसान नहीं है। राजनीतिक रिश्तों में उतार-चढ़ाव, फंडिंग के मुद्दे, और अलग-अलग कार्यशैलियों में तालमेल बैठाना एक बड़ी चुनौती रही है।
निर्णायक मोड़: ITER प्रोजेक्ट की वर्तमान स्थिति
सच यह है कि ITER प्रोजेक्ट अभी तक पूरी तरह से परिचालन के चरण में नहीं पहुंचा है। 2025 का लक्ष्य इसके निर्माण और असेंबली के महत्वपूर्ण चरणों को पूरा करने का था। हालांकि, महामारी और अन्य चुनौतियों के कारण समयसीमा प्रभावित हुई है।
तो फिर ‘निर्णायक मोड़’ क्या है?
“निर्णायक मोड़” से तात्पर्य उस महत्वपूर्ण असेंबली फेज से है जो वर्तमान में चल रहा है। यह कोई एक दिन की घटना नहीं, बल्कि एक निरंतर चल रही प्रक्रिया है। इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा – वैक्यूम वेसल के विशाल खंडों को जोड़ने का कार्य – पिछले कुछ वर्षों में शुरू हो चुका है और लगातार जारी है।
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वैक्यूम वेसल क्या है? यह वह विशाल स्टील का चैम्बर है जो रिएक्टर का “दिल” होगा। यही वह स्थान है जहाँ भविष्य में प्लाज़्मा का निर्माण होगा और संलयन की अद्भुत प्रक्रिया घटित होगी।
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चुनौती क्यों है? इस वेसल को इतने बड़े पैमाने पर बनाया गया है कि इसे एक साथ नहीं बनाया जा सकता। इसे नौ विशालकाय खंडों में बनाकर, ITER साइट पर लाया गया और अब उन्हें अत्यंत सटीकता के साथ जोड़ा जा रहा है। यह कार्य अपने आप में एक बहुत बड़ी इंजीनियरिंग उपलब्धि है।
वैक्यूम वेसल वह मुख्य कक्ष है जहाँ असल में संलयन की प्रक्रिया होगी। यह एक विशाल स्टील का बना हुआ बर्तन है, जिसे इतने बड़े पैमाने पर बनाया गया है कि इसे एक साथ नहीं बनाया जा सकता था। इसे नौ बड़े-बड़े हिस्सों में बनाया गया है, जिन्हें अब साइट पर लाकर जोड़ा जा रहा है। यह काम बेहद नाजुक और सटीकता वाला है। एक मिलीमीटर की भी गलती पूरे प्रोजेक्ट के लिए घातक हो सकती है।
इस चरण के सफल होने का मतलब होगा कि ITER का “दिल” यानी मुख्य रिएक्टर अब आकार ले रहा है। यह साबित करेगा कि संलयन ऊर्जा सिर्फ एक सैद्धांतिक विचार नहीं, बल्कि एक ठोस हकीकत बनने की राह पर है। यह एक ऐसी मशीन होगी जिसे सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि एक-एक नट-बोल्ट जोड़कर, दुनिया के सबसे बेहतरीन दिमागों ने मिलकर बनाया है।
भविष्य की राह: आगे क्या है?
वैक्यूम वेसल के जुड़ने के बाद, अगले कदमों में सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट्स को इंस्टॉल करना, कूलिंग सिस्टम को लगाना और सारे सिस्टम्स का टेस्ट करना शामिल होगा। पहला प्लाज़्मा प्रयोग 2035 तक होने की उम्मीद है। इसके बाद, ड्यूटीरियम-ट्रिटियम संलयन प्रयोग शुरू होंगे।
अगर ITER सफल होता है, तो इसके बाद DEMO नाम का एक और एडवांस्ड रिएक्टर बनाया जाएगा, जो सीधे तौर पर बिजली ग्रिड के लिए बिजली पैदा करने में सक्षम होगा। ITER की सफलता मानव सभ्यता के लिए एक नए युग की शुरुआत होगी – एक ऐसा युग जहाँ ऊर्जा की कमी और प्रदूषण जैसी कोई चिंता नहीं होगी।
निष्कर्ष
ITER प्रोजेक्ट मानव साहस, जिज्ञासा और सहयोग की एक अद्भुत मिसाल है। यह हमें याद दिलाता है कि बड़ी चुनौतियों से घबराने के बजाय, उनका सामला करने के लिए हम एकजुट हो सकते हैं। भले ही इसमें देरी हो रही हो और चुनौतियाँ आ रही हों, लेकिन आज ITER जिस मुकाम पर पहुँचा है, वह अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह प्रोजेक्ट न सिर्फ विज्ञान की दुनिया में एक क्रांति लाने की क्षमता रखता है, बल्कि यह हम सभी को एक बेहतर, स्वच्छ और उज्जवल भविष्य की आशा दिखाता है। हमारी नजरें अब इस निर्णायक मोड़ के परिणाम पर टिकी हैं।









