इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: किरायेदारी कानून पर साफ संदेश, लिखित करार न होने पर भी बेदखली की कार्रवाई संभव

उत्तर प्रदेश में किरायेदारी से जुड़े विवाद हमेशा से आम रहे हैं। शहरों से लेकर कस्बों तक लाखों लोग किराये के मकानों में रहते हैं, लेकिन आज भी एक बड़ी संख्या ऐसी है जहाँ लिखित किरायेदारी करार (Written Tenancy Agreement) नहीं बनाया जाता। इसी कारण सालों से यह धारणा बनी हुई थी कि अगर लिखित करार नहीं है, तो मकान मालिक किरायेदार को बेदखल नहीं कर सकता।
अब इस सोच पर इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने बड़ा और साफ फैसला सुना दिया है, जिसने न केवल कानून की सही व्याख्या की है बल्कि हजारों मकान मालिकों और किरायेदारों को स्थिति स्पष्ट कर दी है।
यह फैसला उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 (UP Urban Premises Tenancy Regulation Act, 2021) के तहत दिया गया है और इसका सीधा असर आने वाले समय में किरायेदारी से जुड़े हर मामले पर पड़ेगा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: बिना लिखित किरायेदारी करार भी बेदखली संभव
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: बिना लिखित किरायेदारी करार भी बेदखली संभव

क्या लिखित किरायेदारी करार न होने पर बेदखली नहीं हो सकती थी?

अब तक आम धारणा यही थी कि अगर किरायेदारी लिखित नहीं है, तो मामला कोर्ट या रेंट अथॉरिटी में टिकेगा ही नहीं। कई किरायेदार इसी बात का फायदा उठाकर सालों तक मकान पर कब्जा जमाए बैठे रहते थे। मकान मालिक चाहकर भी कोई कानूनी कार्रवाई नहीं कर पाते थे क्योंकि सामने से यही तर्क दिया जाता था कि “कोई एग्रीमेंट नहीं है, इसलिए केस ही नहीं बनता।”
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस भ्रम को पूरी तरह खत्म कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि लिखित करार न होना बेदखली की कार्रवाई में कोई कानूनी रुकावट नहीं है।
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मामला क्या था? पूरा केस समझिए आसान भाषा में

यह मामला एक मकान मालिक और किरायेदार के बीच उत्पन्न विवाद से जुड़ा था। मकान मालिक ने रेंट अथॉरिटी (Rent Authority) के सामने आवेदन दिया कि किरायेदार को मकान खाली कराया जाए।
किरायेदार ने इस आवेदन का विरोध करते हुए तीन मुख्य दलीलें दीं:
  • दोनों पक्षों के बीच कोई लिखित किरायेदारी करार नहीं है
  • मकान मालिक ने किरायेदारी से जुड़ी पूरी जानकारी नहीं दी
  • इसलिए रेंट अथॉरिटी के पास इस मामले को सुनने का अधिकार (Jurisdiction) ही नहीं है
किरायेदार का सीधा तर्क था – “जब करार ही नहीं है, तो केस कैसे चलेगा?”

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा? फैसला क्यों ऐतिहासिक है

जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल की पीठ ने किरायेदार की सभी दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि:
“उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के तहत रेंट अथॉरिटी को यह अधिकार है कि वह बेदखली के आवेदन पर सुनवाई करे, चाहे किरायेदारी लिखित हो या नहीं।”
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि लिखित करार का न होना केवल एक तकनीकी पहलू है, न कि ऐसा आधार जिससे पूरा केस ही खारिज कर दिया जाए।
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फैसले की सबसे अहम बातें, जो हर किसी को जाननी चाहिए

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से कुछ बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आए हैं।
1. सबसे पहली और बड़ी बात यह है कि तकनीकी कमियाँ न्याय के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं। अगर किरायेदारी का रिश्ता मौजूद है और उसके प्रमाण हैं, तो सिर्फ इस वजह से कि कागज नहीं है, मकान मालिक को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।
2. दूसरी अहम बात यह है कि कोर्ट ने कानून के उद्देश्य को प्राथमिकता दी। यूपी शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 का मकसद है कि किरायेदारी विवादों का तेज, सरल और प्रभावी निपटारा हो। अगर हर केस को छोटी-छोटी तकनीकी बातों पर खारिज कर दिया जाए, तो कानून का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।
3. तीसरी बात यह है कि कोर्ट ने यह भी कहा कि किरायेदार के अधिकार पूरी तरह सुरक्षित हैं। उसे पूरा मौका मिलेगा कि वह यह साबित करे कि उसका कब्जा वैध है। लेकिन सिर्फ “लिखित करार नहीं है” कहना अब बचाव का हथियार नहीं बनेगा।

मकान मालिकों के लिए यह फैसला क्यों बड़ी राहत है

उत्तर प्रदेश में आज भी ज्यादातर किरायेदारी मौखिक (Oral Agreement) पर ही चलती है। खासकर पुराने मोहल्लों, कस्बों और छोटे शहरों में लिखित करार का चलन बहुत कम रहा है। ऐसे में यह फैसला मकान मालिकों के लिए किसी राहत से कम नहीं है।
अब मकान मालिक बिना लिखित किरायेदारी करार के भी रेंट अथॉरिटी में बेदखली की कार्रवाई शुरू कर सकते हैं। उन्हें सीधे सिविल कोर्ट के लंबे और महंगे मुकदमों में नहीं जाना पड़ेगा।
इसके अलावा अब केस सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि वास्तविक तथ्यों और सबूतों पर तय होगा। जैसे –
बैंक ट्रांजेक्शन, किराया देने के मैसेज, गवाहों के बयान, बिजली-पानी के बिल आदि।

किरायेदारों के लिए क्या संदेश देता है यह फैसला

यह फैसला किरायेदारों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अब यह साफ हो गया है कि सिर्फ इस आधार पर कि किरायेदारी लिखित नहीं है, कोई भी किरायेदार खुद को पूरी तरह सुरक्षित नहीं मान सकता।
अगर किराया समय पर नहीं दिया जा रहा, शर्तों का उल्लंघन हो रहा है या मकान मालिक को परेशान किया जा रहा है, तो बेदखली की कार्रवाई संभव है।
हालाँकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि किरायेदार के अधिकार खत्म नहीं होते। मौखिक किरायेदारी भी कानूनन मान्य है, लेकिन जिम्मेदारी दोनों पक्षों की बराबर होगी।

यूपी शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 क्यों है खास

यह नया कानून पुराने UP Rent Control Act, 1972 की जगह लाया गया है। इसका मकसद किरायेदारी कानून को आधुनिक और व्यावहारिक बनाना है।
इस अधिनियम के तहत:
  • हर जिले में Rent Authority बनाई गई है
    विवादों के निपटारे के लिए समयसीमा तय की गई है
  • ऑनलाइन आवेदन और सुनवाई को बढ़ावा दिया गया है
  • किराया तय करने और विवाद सुलझाने के स्पष्ट अधिकार दिए गए हैं
सबसे अहम बात – इस कानून में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि लिखित किरायेदारी करार के बिना केस नहीं चलेगा।

भारत में किरायेदारी की मौजूदा स्थिति: कुछ जरूरी आंकड़े

भारत में तेजी से शहरीकरण हो रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2030 तक देश की लगभग 40% आबादी शहरों में रहने लगेगी। इससे किराये के मकानों की मांग और विवाद दोनों बढ़ेंगे।
एक अनुमान के मुताबिक, भारत में केवल 30–35% किरायेदारी करार ही लिखित होते हैं। बाकी मौखिक या अनौपचारिक होते हैं।
रियल एस्टेट और किरायेदारी से जुड़े विवादों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नए कानूनों और रेंट अथॉरिटी के आने से अब इन मामलों का निपटारा 6 से 12 महीने में हो रहा है, जो पहले 3–5 साल तक खिंच जाता था।
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व्यावहारिक सलाह: अब क्या करें मकान मालिक और किरायेदार

मकान मालिकों के लिए:
  • लिखित किरायेदारी करार जरूर बनाएं, भले ही कानून इसकी बाध्यता न लगाए।
  • किराये से जुड़े हर लेन-देन का रिकॉर्ड रखें।
  • रेंट अथॉरिटी का रास्ता अपनाएं, यह तेज और सस्ता है।
किरायेदारों के लिए:
  • लिखित एग्रीमेंट की मांग करें।
  • डिजिटल भुगतान करें और रसीद सुरक्षित रखें।
  • कानूनी अधिकारों के साथ-साथ जिम्मेदारियों को भी समझें।

निष्कर्ष:

कानून का उद्देश्य न्याय है, कागज नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला साफ संदेश देता है कि कानून तकनीकी खामियों के लिए नहीं, बल्कि न्याय के लिए होता है। लिखित किरायेदारी करार न होने के बावजूद बेदखली की कार्रवाई संभव है – यह अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है।
यह फैसला न सिर्फ उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे देश के लिए एक मजबूत मिसाल है। आने वाले समय में किरायेदारी कानून और अधिक पारदर्शी, सरल और आम लोगों के हित में होगा।
नोट: यह लेख सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी कानूनी कार्रवाई से पहले योग्य वकील से सलाह जरूर लें।

FAQ:-

❓ क्या बिना लिखित किरायेदारी करार के बेदखली हो सकती है?
हाँ, इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के अनुसार लिखित करार न होने पर भी रेंट अथॉरिटी बेदखली के मामले की सुनवाई कर सकती है।
❓ रेंट अथॉरिटी को बेदखली का अधिकार कब मिलता है?
UP शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के तहत रेंट अथॉरिटी को किरायेदारी विवाद और बेदखली की कार्रवाई का पूरा अधिकार है।
❓ क्या मौखिक किरायेदारी (Oral Tenancy) कानूनी रूप से मान्य है?
हाँ, मौखिक किरायेदारी भी कानूनन मान्य है, बशर्ते उसके सबूत मौजूद हों।
❓ किरायेदार बिना कारण बेदखल किया जा सकता है?
नहीं, बेदखली के लिए वैध कानूनी कारण होना जरूरी है। केवल मनमाने ढंग से किरायेदार को नहीं निकाला जा सकता।
❓ लिखित किरायेदारी करार क्यों जरूरी है?
लिखित करार विवाद से बचाता है और दोनों पक्षों के अधिकार व जिम्मेदारियाँ स्पष्ट करता है।

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