दुनिया में अब ऊर्जा की दिशा बदल रही है। पेट्रोल-डीजल का जमाना धीरे-धीरे खत्म हो रहा है और उसकी जगह ले रही है स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EVs) की तेज़ी से बढ़ती लहर। लेकिन इस क्रांति के पीछे जो सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं, वे हैं “क्रिटिकल मिनरल्स” — यानी ऐसे दुर्लभ खनिज जो नई तकनीक, बैटरी और हरित ऊर्जा का आधार हैं।

अब तक लिथियम को इस दौड़ का सबसे अहम खिलाड़ी माना जाता था, लेकिन वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का कहना है कि अब “ग्रेफाइट (Graphite)” ही असली गेम-चेंजर साबित हो रहा है।
ग्रेफाइट क्या है और क्यों इतना जरूरी हो गया है?
Graphite एक प्रकार का कार्बन मिनरल है। इसे आप समझ सकते हैं जैसे लोहा धातु उद्योग की रीढ़ है, वैसे ही Graphite बैटरी इंडस्ट्री की रीढ़ है।
दरअसल, जब हम “लिथियम-आयन बैटरी” कहते हैं, तो उसमें सिर्फ लिथियम ही नहीं, बल्कि Graphite भी उतना ही अहम होता है। यह बैटरी के एनोड (Anode) हिस्से में इस्तेमाल किया जाता है, जो चार्जिंग और डिस्चार्जिंग के समय आयनों को स्टोर करने का काम करता है।
Graphite बिजली का बहुत अच्छा संवाहक (Conductive) होता है और बेहद ज्यादा तापमान झेल सकता है। यही वजह है कि इसे न सिर्फ बैटरियों में बल्कि स्टील, रिफ्रैक्ट्री, इलेक्ट्रोड, फाउंड्री और न्यूक्लियर रिएक्टरों तक में इस्तेमाल किया जाता है।
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चीन की पकड़ और दुनिया में ग्रेफाइट की होड़
आज की तारीख में चीन दुनिया का सबसे बड़ा ग्रेफाइट उत्पादक देश है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, चीन वैश्विक ग्रेफाइट उत्पादन का करीब 75% हिस्सा अकेले रखता है। यही वजह है कि बैटरी बनाने वाली पूरी दुनिया चीन पर निर्भर है।
दुनिया के शीर्ष ग्रेफाइट भंडार (2024 के आंकड़े):
देश प्राकृतिक Graphite भंडार (मेट्रिक टन में)
चीन 81 लाख टन
ब्राजील 74 लाख टन
Madagascar 27 लाख टन
मोजांबिक 25 लाख टन
तंजानिया 18 लाख टन
रूस 14 लाख टन
भारत 8.6 लाख टन
तुर्की 6.9 लाख टन
यानी भारत दुनिया में सातवें नंबर पर आता है, लेकिन खास बात यह है कि भारत में कई इलाकों में अभी भी नई खोजें जारी हैं, इसलिए भविष्य में भारत की रैंक और ऊपर जा सकती है।

भारत के पास Graphite का विशाल खजाना
भारत में अरुणाचल प्रदेश को ग्रेफाइट का सबसे बड़ा घर कहा जा सकता है। यहां के पश्चिमी सियांग, लोअर सुबानसिरी और पापुमपारे जिलों में बड़े पैमाने पर Graphite की खोज की गई है। इसके अलावा झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में भी अच्छे भंडार मिले हैं। भारत के पास कुल 211 मिलियन टन से अधिक Graphite संसाधन हैं, जिसमें लगभग 8.6 मिलियन टन रिजर्व (भंडार) के रूप में प्रमाणित हैं।
इन आंकड़ों से साफ है कि भारत इस खनिज के मामले में किसी भी देश से पीछे नहीं है। अब जरूरत है सिर्फ सही नीतियों और उत्पादन बढ़ाने की।
ग्रेफाइट से कैसे बनेगी ‘स्वच्छ ऊर्जा क्रांति’
दुनिया आज “ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन” के दौर में है। 2024 में जारी IRENA (International Renewable Energy Agency) की रिपोर्ट के मुताबिक, “2030 तक दुनिया में ग्रेफाइट की मांग आज की तुलना में तीन गुना बढ़ जाएगी।”
ऐसा इसलिए क्योंकि इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EVs), सौर ऊर्जा (Solar) और पवन ऊर्जा (Wind) के लिए इस्तेमाल होने वाली बैटरियां Graphite पर निर्भर हैं।
Graphite की दो किस्में होती हैं —
1. नेचुरल ग्रेफाइट (Natural Graphite) — जो खनिज के रूप में जमीन से निकाली जाती है।
2. सिंथेटिक ग्रेफाइट (Synthetic Graphite) — जो पेट्रोलियम कोक और अन्य पदार्थों से बनाई जाती है।
नेचुरल Graphite सस्ती और पर्यावरण के लिए बेहतर होती है, लेकिन इसे शुद्ध बनाने की प्रक्रिया कठिन है। सिंथेटिक ग्रेफाइट ज्यादा शुद्ध होती है, मगर उसे तैयार करने में बहुत ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है और इससे कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ता है।
भारत के लिए बड़ा मौका: आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
भारत सरकार ने हाल के वर्षों में क्रिटिकल मिनरल्स की एक सूची जारी की है, जिसमें Graphite को “स्ट्रैटेजिक मिनरल” माना गया है। सरकार ने अरुणाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और कश्मीर जैसे इलाकों में नए खनन प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दी है।
‘मेक इन इंडिया’ और ‘नेट जीरो 2070’ लक्ष्यों को देखते हुए, भारत का फोकस अब इस दिशा में है कि
- लिथियम-आयन बैटरी के लिए Graphite का घरेलू उत्पादन बढ़ाया जाए,
- कृत्रिम ग्रेफाइट पर निर्भरता घटे, और चीन से आने वाले आयात में कमी लाई जाए।
वर्तमान में भारत अपनी लगभग 60% Graphite जरूरतों को आयात करता है, जो आत्मनिर्भरता की राह में एक बड़ी चुनौती है। लेकिन अगर अरुणाचल प्रदेश और झारखंड के भंडारों का सही उपयोग किया गया, तो आने वाले कुछ वर्षों में भारत चीन के बाद एशिया का सबसे बड़ा ग्रेफाइट केंद्र बन सकता है।
वैज्ञानिकों की राय: “ग्रेफाइट है भविष्य की बैटरी की रीढ़”
नेचर (Nature) पत्रिका की रिपोर्ट में कहा गया है कि, “ग्रेफाइट अब दुनिया का नया क्रिटिकल मिनरल बन चुका है। यह लिथियम-आयन बैटरी की रीढ़ है, जिसके बिना भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था अधूरी है।”
रिपोर्ट के अनुसार, बैटरी-ग्रेड Graphite की शुद्धता 99.9% होनी चाहिए। इसे हासिल करने के लिए नई तकनीक और ग्रीन प्रोसेसिंग की जरूरत होगी। भारत इस दिशा में तेजी से काम कर रहा है — खासकर IIT और खनन मंत्रालय मिलकर “Green Graphite Initiative” पर रिसर्च कर रहे हैं।
चुनौतियां भी कम नहीं
1. तकनीकी पिछड़ापन: भारत के पास संसाधन हैं, लेकिन अभी तक बैटरी-ग्रेड ग्रेफाइट को प्रोसेस करने की क्षमता सीमित है।
2. आयात निर्भरता: भारत हर साल लगभग 200 मिलियन डॉलर से ज्यादा का ग्रेफाइट चीन से आयात करता है।
3. पर्यावरणीय जोखिम: ग्रेफाइट को सिंथेटिक रूप में बनाने की प्रक्रिया में भारी ऊर्जा लगती है और कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है।
4. रीसायक्लिंग की कमी: पुरानी बैटरियों से ग्रेफाइट को रीसायकल करने की तकनीक भारत में शुरुआती स्तर पर है।
समाधान की राह: “Green Graphite” और रीसायक्लिंग
दुनिया अब “ग्रीन ग्रेफाइट” की ओर बढ़ रही है — यानी ऐसा ग्रेफाइट जो नवीकरणीय कार्बन स्रोतों से तैयार किया जाए या पुरानी बैटरियों से रीसायकल किया जाए।
इससे दो बड़े फायदे होंगे —
1. पर्यावरण पर दबाव कम होगा,
2. और उत्पादन की लागत घटेगी।
भारत ने इसके लिए 2025 में नेशनल बैटरी रीसायक्लिंग मिशन की शुरुआत की है, जिसमें ग्रेफाइट सहित कई क्रिटिकल मिनरल्स के पुन: उपयोग का लक्ष्य रखा गया है।
इलेक्ट्रिक वाहनों की बढ़ती मांग से बढ़ेगी ग्रेफाइट की अहमियत
भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग तेजी से बढ़ रही है। ऊर्जा मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक देश में लिथियम-आयन बैटरी की मांग 115 GWh तक पहुंच जाएगी। इसका सीधा मतलब है कि ग्रेफाइट की मांग भी अब कई गुना बढ़ेगी।
आज EV बनाने वाली कंपनियां जैसे टाटा, महिंद्रा, ओला इलेक्ट्रिक और हुंडई इंडिया पहले ही सरकार से स्थानीय Graphite सोर्सिंग को लेकर बात कर रही हैं। अगर उत्पादन बढ़ाया गया, तो यह न सिर्फ EV उद्योग के लिए फायदेमंद होगा बल्कि भारत को ग्लोबल बैटरी हब बनाने में मदद करेगा।
निष्कर्ष: भारत के पास सुनहरा मौका
अब यह पूरी तरह साफ है कि दुनिया में “लिथियम के बाद ग्रेफाइट” ही नया एनर्जी ट्रेजर (Energy Treasure) बन चुका है। यह वह खनिज है जो इलेक्ट्रिक गाड़ियों, ऊर्जा भंडारण और भविष्य की स्वच्छ तकनीकों की रीढ़ बनने जा रहा है।
भारत के पास न केवल पर्याप्त Graphite संसाधन हैं, बल्कि नीति-स्तर पर सही कदम उठाकर वह आने वाले वर्षों में चीन की दादागिरी को चुनौती दे सकता है।
जरूरत है सिर्फ —
👉 तेज़ खोज और खनन पर जोर देने की,
👉 रीसायक्लिंग टेक्नोलॉजी अपनाने की,
👉 और ग्रीन एनर्जी के साथ “ग्रीन ग्रेफाइट” उत्पादन की।
अगर यह सब योजनाबद्ध तरीके से हुआ,
तो आने वाले दशक में भारत सिर्फ “ग्रेफाइट का उत्पादक” नहीं बल्कि दुनिया की स्वच्छ ऊर्जा क्रांति का नेतृत्व करने वाला देश बन सकता है।









