सिद्धार्थ श्रीवास्तव और सूफियान सिद्दिकी: माँ के फोन से लेकर ‘The Society Book’ तक, एक एक्टर का वो सफर जो आपको रुला देगा

बॉलीवुड का आकाश जहाँ कुछ चमकदार सितारे हमेशा चर्चा में बने रहते हैं, वहीं कुछ ऐसे प्रतिभाशाली कलाकार भी हैं जो अपनी मेहनत, लगन और कला के बलबूते धीरे-धीरे अपनी एक अलग पहचान बना रहे हैं। ऐसे ही दो नाम हैं सिद्धार्थ श्रीवास्तव और सूफियान सिद्दिकी। ये दोनों कलाकार पिछले एक दशक से भी अधिक समय से फिल्म और टेलीविज़न की दुनिया में अपनी छाप छोड़ने के लिए संघर्षरत हैं। भले ही उन्हें वह चमकती सफलता और व्यापक मान्यता अभी तक नहीं मिली, जिसके वे हकदार हैं, लेकिन उनकी यात्रा हौसले, हिम्मत और निरंतरता की मिसाल है।

शुरुआती दिन: सपनों की नींव और संघर्ष की ठोस ज़मीन

सिद्धार्थ श्रीवास्तव ने अपने करियर की शुरुआत विभिन्न टेलीविज़न धारावाहिकों और फिल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाओं से की। उन्होंने ‘देवों के देव… महादेव’, ‘सी.आई.डी.’, ‘क्राइम पेट्रोल’, ‘सावधान इंडिया’ जैसे लोकप्रिय शोज में काम करके अपने अभिनय को निखारा। इन शोज ने उन्हें कैमरे के सामने रहने का, विभिन्न किरदारों को जीने का और एक व्यवस्थित कार्यशैली सीखने का मौका दिया। इसके समानांतर, उन्होंने फिल्मों में भी अपना रास्ता बनाना शुरू किया। ‘आश्रम’, ‘ठुकरा के मेरा प्यार’, ‘परिवार’, ‘बीहड़ का बागी मालिक’, ‘निशानची’, ‘पहेली गली का अमिताभ’, ‘भूख दी वार’, ‘तर्पण’ जैसी फिल्मों में उन्होंने मुख्य और महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। हर फिल्म एक नया प्रयोग थी, हर किरदार एक नई चुनौती।
सिद्धार्थ श्रीवास्तव और सूफियान सिद्दिकी: कहानी दो एक्टर की
सिद्धार्थ श्रीवास्तव और सूफियान सिद्दिकी कहानी दो एक्टर की
वहीं, सूफियान सिद्दिकी भी इसी संघर्ष पथ के साथी रहे हैं। दोनों ने एक-दूसरे का साथ पाकर कई प्रोजेक्ट्स में काम किया। यह साथ केवल स्क्रीन पर ही नहीं, बल्कि स्क्रीन के बाहर भी एक सामान्य लक्ष्य की ओर बढ़ने का सहयोग बना। दोनों ही इस बात को मानते हैं कि बॉलीवुड में रातों-रात सफलता पाना एक भ्रम है। असली सफलता तो निरंतर प्रयास, अपने कौशल को निखारते रहने और उचित अवसर की प्रतीक्षा में छिपी है।

वो दिन जब ‘हाँ’ कहने को कोई भूमिका ही नहीं थी

पहले पाँच साल सबसे कठिन थे। सिद्धार्थ याद करते हैं, “हम दोनों का रोज़ का रूटीन था – सुबह उठना, ऑडिशन के लिए तैयार होना, और मुम्बई की गर्मी-भरी बसों में सवार होकर एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो तक भटकना। कास्टिंग डायरेक्टर का फोन आते ही दिल की धड़कन बढ़ जाती। कई बार तो बस यही सुनने को मिलता – ‘लुक ठीक नहीं है’, ‘आवाज़ फिल्म के हीरो जैसी नहीं’, ‘ओवरऐक्ट कर रहे हो’। नकारा जाना एक आदत-सा बन गया था।”
उन दिनों की सबसे बड़ी चुनौती थी – आत्मविश्वास को बचाए रखना। सूफियान बताते हैं, “घर से पैसे आना बंद हो गए थे। छोटे-छोटे शोज़ और एड फिल्म्स से जो कमाते, उससे महीने के आखिरी हफ्ते में सिर्फ नूडल्स बनाकर खाते। एक कमरे में तीन-तीन लोग रहते। पर सबसे मुश्किल था घर वालों का फोन। जब माँ पूछतीं – ‘बेटा, सब ठीक तो है? टीवी पर तुम्हें कभी देख नहीं पाते’, तो गला भर आता था। उस वक्त लगता था, शायद यह रास्ता गलत है।”

आज का मुकाम और कल के सपने

आज, 2025 में, सिद्धार्थ और सूफियान उस मुकाम पर हैं, जहाँ उनकी मेहनत ने एक आधार तो बना ही दिया है। ‘द सोसाइटी बुक’ एक समुदाय बन चुका है, जहाँ नए कलाकार सीखते हैं और साझा करते हैं। उनके पास अब वह आत्मविश्वास है, जो केवल संघर्ष से ही आता है।
“सफलता हमारे लिए अब कोविड के बाद पहली फिल्म की शूटिंग का कॉल आना नहीं है,” सिद्धार्थ कहते हैं, “सफलता वो संतुष्टि है जब एक युवा कलाकार हमें फोन करके कहता है कि ‘सर, आपके वीडियो देखकर मैंने हिम्मत नहीं हारी।’ सफलता यह है कि हमने हार नहीं मानी।”
सूफियान आगे कहते हैं, “हाँ, हम अभी भी वह बड़ा ब्रेक पाने के लिए तैयार हैं। लेकिन अब डर नहीं लगता। क्योंकि हमने सीख लिया है कि अगर एक दरवाज़ा नहीं खुलेगा, तो हम दीवार तोड़कर नया रास्ता बना लेंगे। हमारी ‘सोसाइटी’ हमारी ताकत है।”
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महत्वपूर्ण भूमिकाएँ और एक विशिष्ट पहचान की तलाश

सिद्धार्थ श्रीवास्तव ने जिन फिल्मों में काम किया, वे अक्सर सामाजिक सरोकारों, प्रेम कहानियों, या फिर एक्शन और थ्रिल से जुड़ी रही हैं। ‘बीहड़ का बागी मालिक’ और ‘निशानची’ जैसी फिल्मों में उन्होंने मुख्य भूमिकाओं में रहकर अपने एक्शन और ड्रामा कौशल का प्रदर्शन किया। ‘पहेली गली का अमिताभ’ और ‘तर्पण’ जैसी फिल्मों ने उन्हें एक संवेदनशील और गंभीर अभिनेता के रूप में दर्शकों के सामने लाया।
लेकिन एक कड़वी सच्चाई यह है कि बॉलीवुड का बाज़ारीकरण और प्रचार तंत्र अक्सर ऐसी फिल्मों और कलाकारों को वह व्यापक प्लेटफॉर्म नहीं दे पाता, जिसकी उन्हें ज़रूरत होती है। इसके बावजूद, सिद्धार्थ और सूफियान ने कभी हार नहीं मानी। उनका मानना था कि अगर एक दरवाज़ा बंद होता है, तो दूसरा खोलने का प्रयास स्वयं करना होगा।

एक नई पहल: ‘द सोसाइटी बुक’ चैनल का सृजन

अपनी कला को सीधे दर्शकों तक पहुँचाने और एक स्वतंत्र पहचान बनाने की चाह ने इन दोनों कलाकारों को एक अनूठे कदम की ओर अग्रसर किया – अपना खुद का यूट्यूब चैनल शुरू करना। द सोसाइटी बुक नामक यह चैनल उनकी रचनात्मकता, उद्यमशीलता और दर्शकों से सीधे जुड़ने की इच्छा का प्रतीक है। इस चैनल के माध्यम से वे न केवल अपने काम को प्रदर्शित कर रहे हैं, बल्कि नए कलाकारों को भी एक मंच दे रहे हैं। यह चैनल उनकी सक्रियता और डिजिटल युग में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की समझदारी को दर्शाता है। यह साबित करता है कि आज का कलाकार सिर्फ एक भूमिका तक सीमित नहीं, बल्कि एक सृजक, निर्माता और विजनरी भी हो सकता है।
इस बीच, फिल्मों में भी धीरे-धीरे बदलाव आया। ‘बीहड़ का बागी मालिक’, ‘निशानची’ और ‘तर्पण’ जैसी फिल्मों ने उन्हें एक समर्पित अभिनेता के रूप में एक विशिष्ट पहचान दिलानी शुरू की। बॉलीवुड के कुछ कास्टिंग डायरेक्टर अब उन्हें नाम से जानने लगे थे। लखनऊ में, वे एक प्रेरणा बन चुके थे।

लखनऊ से बॉलीवुड तक: एक मज़बूत मुकाम की ओर

आज सिद्धार्थ श्रीवास्तव ने लखनऊ में एक सम्मानजनक मुकाम हासिल कर लिया है। लखनऊ की सांस्कृतिक भूमि ने हमेशा से कलाकारों को पनपने का अवसर दिया है। यहाँ उन्हें स्थानीय स्तर पर वह प्रेम और सम्मान मिला, जो किसी भी कलाकार के लिए ईंधन का काम करता है। यह प्रेम ही उन्हें बॉलीवुड की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति देता है।
धीरे-धीरे, बॉलीवुड के गलियारों में भी उनके नाम की चर्चा होने लगी है। उनके द्वारा किए गए काम की सराहना एक जानकार वर्ग द्वारा की जाने लगी है। यह सफलता रातोंरात नहीं, बल्कि लगभग दस वर्षों के अथक परिश्रम, असफलताओं से सीखने और कभी झुकने न देने वले जज़्बे का परिणाम है। सूफियान सिद्दिकी का साथ इस यात्रा को और भी सार्थक बनाता है।

एक अधूरी नहीं, जारी रहने वाली गाथा

सिद्धार्थ श्रीवास्तव और सूफियान सिद्दिकी की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। यह तो बस एक नए अध्याय की शुरुआत है। यह कहानी उन सभी के लिए एक दस्तावेज़ है, जो सोचते हैं कि सफलता की रेस में देर हो गई है। यह याद दिलाती है कि कभी-कभी सबसे बड़ी जीत, अपने सपने को जीवित रखने में होती है। और जब दो लोग मिलकर, एक-दूसके सहारे, एक ‘सोसाइटी’ बना लेते हैं, तो फिर कोई मुश्किल उन्हें रोक नहीं सकती। उनका संघर्ष अब केवल उनका नहीं, उन सभी की आवाज़ बन चुका है, जो बिना किसी सहारे के, अपनी मेहनत से आसमान छूना चाहते हैं। और यही तो किसी भी संघर्ष की सबसे बड़ी विजय होती है।

निष्कर्ष: सफलता की नई परिभाषा गढ़ते दो साधक

सिद्धार्थ श्रीवास्तव और सूफियान सिद्दिकी की कहानी केवल फिल्मी सफलता की कहानी नहीं है। यह उन सभी धैर्यवान सपनों की आँखों की कहानी है, जो त्वरित प्रसिद्धि के भंवर में न फँसकर, अपनी कला को पोषित करते हुए आगे बढ़ते हैं। यह उन लोगों के लिए एक प्रेरणा है जो मानते हैं कि रास्ता लंबा हो सकता है, लेकिन मंज़िल उनकी अपनी ही होती है।
उनकी फिल्मोग्राफी, उनका टेलीविज़न कार्य, और अब उनका डिजिटल प्लेटफॉर्म ‘द सोसाइटी बुक’ – ये सब मिलकर एक ऐसे मोज़ेक का निर्माण करते हैं, जो पूर्णता की ओर अग्रसर है। बॉलीवुड में उनका नाम चर्चा में आना इस बात का प्रमाण है कि सच्ची प्रतिभा कभी अनदेखी नहीं रह सकती। भले ही उसे अपनी जगह बनाने में समय लगे।
आज वे जिस मुकाम पर हैं, वह कोई आकस्मिक उपलब्धि नहीं, बल्कि जी-तोड़ मेहनत, अटूट विश्वास और कला के प्रति अनंत प्रेम का स्वाभाविक फल है। सिद्धार्थ श्रीवास्तव और सूफियान सिद्दिकी की यह यात्रा अभी जारी है, और निश्चित ही आने वाले समय में वे भारतीय सिनेमा के परिदृश्य पर और भी गहरी, और भी चमकदार छाप छोड़ेंगे। उनका संघर्ष यह संदेश देता है कि सफलता की सीढ़ी चढ़ने की कोई जल्दी नहीं होती, बस कदम निरंतर चलते रहना चाहिए।

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