राजीव द्विवेदी – परिचय: लखनऊ की उन गलियों में, जहाँ नवाबी तहज़ीब की खुशबू हवा में तैरती है, वहाँ एक छोटी-सी पान की दुकान आज एक बड़ी मिसाल बन गई है। इसके मालिक हैं 50 वर्षीय राजीव कुमार द्विवेदी। गाँव से शहर का सफर तय करने वाले राजीव जी चार बेटियों के पिता हैं। यह कहानी केवल रोज़ी-रोटी की नहीं, बल्कि उस टूटने, बिखरने और फिर खुद को सिलने की कहानी है, जहाँ हर कदम पर संघर्ष ने उनके स्वाभिमान की धार को और तेज़ किया।
संघर्ष की शुरुआत: गाँव से शहर तक – पहला धक्का:
गाँव की सीमित आय और बेटियों के बेहतर भविष्य की चिंता ने राजीव जी को लखनऊ की ओर रुख करने पर मजबूर किया। शहर में उनका पहला संघर्ष था “ओवरएज” और “अनएक्सपीरियंस्ड” का टैग। 40 की उम्र में उन्हें नौकरियों के लिए 25-30 साल के युवाओं से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ी। महीनों तक भटकने के बाद, आखिरकार एक छोटी-सी निजी कंपनी में क्लर्क की नौकरी मिली, जहाँ वेतन मुश्किल से परिवार का पेट भर पाता था। शहर की महंगाई में गाँव जैसा सादा जीवन भी एक लक्जरी बन गया।










