आपने अक्सर यह शिकायत सुनी होगी, या शायद खुद महसूस की होगी – ऑफिस से छुट्टी मिलते ही फोन की घंटी बजने लगती है। ईमेल का नोटिफिकेशन आते ही दिल की धड़कन बढ़ जाती है। व्हाट्सएप के मैसेज पर तुरंत जवाब देने का दबाव बनता है। ऐसा लगता है जैसे ऑफिस की चारदीवारी अब सिर्फ एक भौतिक जगह नहीं, बल्कि हमारे दिमाग में घर कर चुकी है। शाम हो या सुबह, सप्ताहांत हो या छुट्टी का दिन, काम का साया हमेशा हमारे सिर पर मंडराता रहता है। लेकिन अब केरल राज्य एक ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा है, जो शायद भारत के कामकाजी संस्कृति को हमेशा के लिए बदल कर रख दे। इसका नाम है – ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ कानून।

‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ कानून क्या है? (Right to Disconnect Kanoon Kya Hai?)
सीधे और सरल शब्दों में कहें तो, ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ कानून या ‘डिस्कनेक्ट करने का अधिकार’ एक ऐसा कानूनी प्रावधान है जो किसी कर्मचारी को यह अधिकार देता है कि वह अपने निर्धारित काम के घंटों के बाद ऑफिस की ओर से आने वाले फोन कॉल, ईमेल, टेक्स्ट मैसेज या किसी भी तरह के डिजिटल संचार को जवाब देने से मना कर सकता है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य कर्मचारी की ‘काम की जिंदगी’ और ‘निजी जिंदगी’ के बीच एक स्वस्थ और स्पष्ट सीमा रेखा खींचना है।
इसका मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी आलसी बन जाएं या काम से पल्ला झाड़ने लगें। बल्कि, इसका मतलब है कि एक कर्मचारी के पास आराम करने, अपने परिवार के साथ समय बिताने, शौक पूरे करने और दिमाग को तरोताजा करने का अधिकार भी है। जब एक कर्मचारी पूरी तरह से आराम करके वापस आता है, तो उसकी उत्पादकता और रचनात्मकता दोगुनी हो जाती है, जिसका सीधा फायदा कंपनी को भी मिलता है।
केरल सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘राइट टू डिस्कनेक्ट कानून बिल 2025′ इसी सिद्धांत पर आधारित है। अगर यह बिल विधानसभा से पास हो जाता है, तो केरल भारत का पहला ऐसा राज्य बन जाएगा जो अपने निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को यह कानूनी हक देगा।
दुनिया में ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ कानून की स्थिति
भारत से पहले दुनिया के कई विकसित देश इस दिशा में कदम उठा चुके हैं।
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फ्रांस: फ्रांस दुनिया का पहला देश था जिसने साल 2017 में यह कानून लागू किया। यहाँ 50 या उससे अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे कर्मचारियों के काम के घंटों के बाद ईमेल और अन्य संचार पर रोक लगाएँ।
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बेल्जियम: बेल्जियम ने भी 2022 में एक कानून पास किया जो कर्मचारियों को काम के घंटों के बाद ‘ऑफ’ रहने का कानूनी अधिकार देता है।
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आयरलैंड: आयरलैंड सरकार ने 2021 में एक कोड ऑफ प्रैक्टिस जारी किया, जो employers और employees दोनों को यह समझने में मदद करता है कि काम के बाद के समय का सम्मान कैसे किया जाए।
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स्पेन और इटली: इन देशों ने भी ऐसे ही कानूनों को लागू किया है, जहाँ employers कर्मचारियों के आराम के समय में दखलअंदाजी करने पर जुर्माना दे सकते हैं।
इन देशों के अनुभव बताते हैं कि इस कानून से न सिर्फ कर्मचारियों का मानसिक तनाव कम हुआ है, बल्कि समग्र उत्पादकता में भी सुधार देखने को मिला है।

भारत में ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ कानून की जरूरत क्यों है?
भारतीय कामकाजी संस्कृति में अक्सर ‘वफादारी’ और ‘कर्मठता’ का पैमाना यह मान लिया जाता है कि कर्मचारी ऑफिस के बाहर भी कितना ‘अवेलेबल’ है। यही सोच एक गंभीर समस्या का रूप ले चुकी है।
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लगातार बढ़ता तनाव: सेंटर फॉर फ्यूचर ऑफ वर्क की 2022 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 71% कर्मचारियों ने माना कि वे निर्धारित घंटों से ज्यादा काम करते हैं, और अक्सर यह employers के दबाव की वजह से होता है। इनमें से एक-तिहाई लोगों ने अत्यधिक थकान और चिंता की शिकायत की।
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निजी रिश्तों पर असर: इसी रिपोर्ट में लगभग एक चौथाई कर्मचारियों ने कहा कि इसका उनके निजी रिश्तों पर बुरा असर पड़ रहा है। पारिवारिक जीवन और सामाजिक जीवन पूरी तरह से प्रभावित हो रहा है।
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छुट्टियों में भी नहीं मिलता आराम: 2024 के एक सर्वे के अनुसार, 88% भारतीय कर्मचारियों से उनके काम के घंटों के बाद संपर्क किया जाता है। हैरानी की बात यह है कि 85% कर्मचारियों का कहना है कि यह दखलअंदाजी उनकी छुट्टियों के दौरान भी जारी रहती है।
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डर की संस्कृति: इस सर्वे में एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। लगभग 10 में से 8 कर्मचारियों को यह डर सताता है कि अगर उन्होंने ऑफ-आवर के मैसेज या कॉल्स का जवाब नहीं दिया, तो इसका उनकी करियर ग्रोथ पर बुरा असर पड़ेगा। वे सोचते हैं कि उन्हें कम प्रतिबद्ध समझा जाएगा।
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स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के एक अध्ययन में पाया गया कि लंबे समय तक काम करने से दिल की बीमारी और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। इस मामले में भारत दुनिया के सबसे ज्यादा प्रभावित देशों में शामिल है। दुखद है कि यहाँ कई कर्मचारी बिना ओवरटाइम पेमेंट के ही 10-11 घंटे तक का काम करने को मजबूर हैं।
ये आँकड़े साफ दर्शाते हैं कि भारत के कर्मचारी एक गंभीर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य संकट से गुजर रहे हैं। ऐसे में, ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ कानून कोई विलासिता नहीं, बल्कि एक जरूरत बन चुका है।
केरल के ‘राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2025’ की मुख्य बातें
केरल का प्रस्तावित बिल काफी हद तक व्यवस्थित और व्यावहारिक है। आइए जानते हैं इसकी कुछ प्रमुख विशेषताएँ:
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कानूनी अधिकार का औपचारीकरण: यह बिल कर्मचारियों के ‘डिस्कनेक्ट करने के अधिकार’ को एक कानूनी दर्जा देगा। इसके बाद, कोई भी employer अपने कर्मचारी पर काम के घंटों के बाद संपर्क करने या काम करने का दबाव नहीं बना सकता है।
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शिकायत निवारण तंत्र: बिल में जिला स्तर पर ‘प्राइवेट सेक्टर वर्कप्लेस शिकायत निवारण कमेटी’ बनाने का प्रस्ताव है। इस कमेटी की अध्यक्षता क्षेत्रीय संयुक्त श्रम आयुक्त करेंगे। यह कमेटी कर्मचारियों की शिकायतों की जाँच करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि काम के घंटों के नियमों का सही तरीके से पालन हो रहा है।
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निगरानी और अनुपालन: यह पैनल यह भी देखेगा कि employers कर्मचारियों को अनौपचारिक रूप से दबाव तो नहीं बना रहे। अगर कोई कंपनी नियम तोड़ती हुई पाई जाती है, तो कमेटी उसे सही दिशा-निर्देश दे सकती है।
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उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई: बिल में उल्लंघन करने वालों के लिए सजा का प्रावधान भी है। श्रम आयुक्त को यह अधिकार होगा कि वह शिकायत मिलने पर जाँच शुरू कर सकते हैं और उचित कार्रवाई की सिफारिश कर सकते हैं। हालाँकि, जुर्माने या दंड की स्पष्ट रूपरेखा अभी प्रस्तावित बिल में देखने को मिलनी बाकी है।
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क्या यह बिल सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा? चुनौतियाँ और आशंकाएँ
हर नए बदलाव के साथ कुछ चुनौतियाँ भी आती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ कानून बना देने से समस्या का जादुई समाधान नहीं हो जाएगा।
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संस्कृति में बदलाव की जरूरत: सबसे बड़ी चुनौती है ‘हमेशा उपलब्ध रहने’ की मानसिकता को बदलना। बहुत से लोगों को लगता है कि ज्यादा देर तक काम करना और हर समय ऑनलाइन रहना उनकी क्षमता का प्रतीक है। इस सोच को बदलने के लिए जागरूकता की सख्त जरूरत है।
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प्रबंधकों की भूमिका: कई बार प्रबंधक (managers) खुद इस संस्कृति को बढ़ावा देते हैं। उन्हें यह समझाना जरूरी है कि कर्मचारी की उत्पादकता उसके काम के घंटों से नहीं, बल्कि उसके काम की गुणवत्ता से आँकी जानी चाहिए। managers को ट्रेनिंग देना इस कानून के सफल क्रियान्वयन की कुंजी होगी।
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कर्मचारियों का डर: जैसा कि सर्वे में सामने आया, कर्मचारियों को डर है कि अगर वे डिस्कनेक्ट करेंगे तो उनकी पदोन्नति रुक सकती है या उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। इस डर को दूर करने के लिए कानून में कर्मचारियों को पर्याप्त सुरक्षा देनी होगी।
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छोटे उद्योगों पर असर: बड़ी कंपनियों के मुकाबले छोटे और मझोले उद्योगों (SMEs) के लिए इस कानून का पालन करना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। उनके पास संसाधनों की कमी हो सकती है। ऐसे में, उनके लिए कुछ लचीले प्रावधानों पर विचार करना होगा।
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आपात स्थितियों का प्रबंधन: एक सवाल यह भी उठता है कि अगर किसी आपात स्थिति में वाकई में किसी कर्मचारी से संपर्क करना जरूरी हो, तो क्या होगा? कानून में ऐसी स्थितियों को परिभाषित करना और उनके लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश बनाना बेहद जरूरी है।
निष्कर्ष: एक नए युग की शुरुआत
केरल का ‘राइट टू डिस्कनेक्ट’ कानून निश्चित रूप से भारत के कामकाजी परिदृश्य में एक क्रांतिकारी बदलाव लाने की क्षमता रखता है। यह सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश है जो कर्मचारी के मानवीय अधिकारों, उसके मानसिक स्वास्थ्य और उसकी निजी जिंदगी के महत्व को रेखांकित करता है।
यह बिल अगर सही तरीके से लागू होता है, तो इसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम होंगे। कर्मचारी ज्यादा खुश, स्वस्थ और प्रेरित होंगे। उनकी उत्पादकता और रचनात्मकता बढ़ेगी। कंपनियों को employee retention में मदद मिलेगी और एक स्वस्थ कार्य संस्कृति का निर्माण होगा। समाज के स्तर पर, इससे परिवारों के रिश्ते मजबूत होंगे और लोगों का जीवन स्तर सुधरेगा।
हालाँकि, यह सफर आसान नहीं है। इसके लिए सरकार, employers, employees और पूरे समाज को मिलकर काम करना होगा। केरल का यह कदम एक मशाल का काम कर सकता है। हो सकता है कि केरल में शुरू हुई यह चिंगारी जल्दी ही देश के अन्य राज्यों में भी फैल जाए और पूरे भारत की ऑफिस कल्चर हमेशा के लिए बदल जाए। यह कानून सिर्फ ईमेल और कॉल को ‘इग्नोर’ करने का अधिकार नहीं दे रहा, बल्कि हमें अपनी जिंदगी को ‘जीने’ का अधिकार दे रहा है।
कृपया ध्यान दें: यह लेख सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए लिखा गया है। कानून के विशिष्ट प्रावधानों के बारे में अंतिम और सटीक जानकारी के लिए केरल सरकार के आधिकारिक स्रोतों या कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श लें।









