माँ चंद्रिका देवी मंदिर: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ नवाबों की तहजीब, कलाकारी और स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन इस शहर के हृदय में एक ऐसी आध्यात्मिक धारा भी बहती है, जो सदियों से यहाँ के निवासियों की आस्था और श्रद्धा का केंद्र रही है। यह धारा बख्शी का तालाब क्षेत्र में गोमती नदी के पावन तट पर विराजमान माँ चंद्रिका देवी के प्राचीन एवं चमत्कारिक मंदिर से जुड़ी है। यह स्थान केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक सिद्धपीठ, एक महत्वपूर्ण तीर्थ और लखनऊ की कुलदेवी के रूप में पूजा जाने वाला पावन धाम है।

एक पवित्र तीर्थ का परिचय: जहाँ गोमती नदी तीन ओर से लिपटी है
माँ चंद्रिका देवी मंदिर लखनऊ के बख्शी का तालाब इलाके से कुछ दूरी पर स्थित कठवारा गाँव में है। यह स्थान अपने अनूठे भूगोल के लिए प्रसिद्ध है। गोमती नदी इस मंदिर के उत्तर, पश्चिम और दक्षिण—तीन ओर से एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच की तरह लिपटी हुई है, जबकि पूर्व दिशा में महिसागर संगम तीर्थ स्थित है। इस तरह से तीन दिशाओं से नदी से घिरा होना इसे एक त्रिवेणी तीर्थ जैसा पवित्र बना देता है।
यह महिसागर संगम कोई साधारण जलाशय नहीं है। स्थानीय जनश्रुति और पुराणों में इसकी महिमा का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि इस संगम का जल कभी नहीं सूखता, चाहे कितनी भी भीषण गर्मी क्यों न पड़े। ऐसा इसलिए, क्योंकि माना जाता है कि इसका सीधा संबंध पाताल लोक से है और यहाँ एक अदृश्य जलस्रोत सदैव प्रवाहित रहता है। यहाँ का प्राकृतिक वातावरण अत्यंत शांत और सात्विक है। पक्षियों का कलरव, गोमती की लहरों की मधुर आवाज़ और हवा में फैली श्रद्धा की सुगंध भक्तों को सांसारिक उथल-पुथल से दूर एक आंतरिक शांति का अनुभव कराती है।
यह मंदिर देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों में से एक को समर्पित है और इसे नवदुर्गा सिद्धपीठ भी कहा जाता है। स्थानीय मान्यता एवं पुराणों के अनुसार, यहाँ एक प्राचीन नीम के पेड़ के खोखले (कोटर) के भीतर नौ दुर्गाओं की वेदियाँ सदियों से सुरक्षित हैं। इसी कारण यह स्थान साधकों, तांत्रिकों और सिद्धि प्राप्त करने वाले योगियों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहाँ की उर्जा को अत्यंत प्रबल और चमत्कारिक माना जाता है।
पौराणिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: त्रेता से द्वापर तक फैली दिव्य गाथाएँ
माँ चंद्रिका देवी मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण और कर्म पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से मिलता है, जो इसके पौराणिक महत्व को प्रमाणित करता है। इस स्थान की पवित्रता की कथाएँ त्रेता युग से लेकर द्वापर युग तक फैली हुई हैं और इसे एक अति प्राचीन तीर्थ स्थल का दर्जा देती हैं।
1. त्रेता युग: राजकुमार चंद्रकेतु और चंद्रिका का प्रकाश
मान्यता है कि त्रेता युग में लक्ष्मणपुरी (वर्तमान लखनऊ) के अधिपति एवं भगवान श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण के ज्येष्ठ पुत्र राजकुमार चंद्रकेतु अश्वमेध यज्ञ के घोड़े के साथ इसी क्षेत्र से गुजरे थे। रात्रि विश्राम के लिए वे गोमती नदी के तट पर कटकबासा के घने जंगल में रुके। उस रात अमावस्या थी और चारों ओर गहन अंधकार छाया हुआ था। अचानक, घने जंगल से अजीबोगरीब आवाजें आने लगीं और राजकुमार को भय सताने लगा।
तब उन्हें अपनी माता उर्मिला द्वारा सिखाए गए नौ दुर्गाओं के मंत्र याद आए। उन्होंने पूरी श्रद्धा से इन मंत्रों का जाप करते हुए देवी का आह्वान किया। तत्क्षण, एक अद्भुत घटना घटी। गहन अंधकार में एक कोमल, शीतल चंद्रिका (चाँदनी) का प्रकाश फैलने लगा और देवी अपने एक स्वरूप में प्रकट हुईं। उनके मस्तक पर एक दिव्य रत्न (जिसे चंद्रिका कहा जाता है) चमक रहा था। देवी के इस प्रकटीकरण से राजकुमार का सारा भय दूर हो गया। मान्यता है कि देवी सती के माथे पर सजी वह चंद्रिका (रत्न) इसी स्थान पर गिरी थी, जिससे यह भूमि अत्यंत पवित्र हो गई और देवी का नाम चंद्रिका देवी पड़ा।
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2. महाभारत काल: पांडवों का आगमन और सुधन्वा कुंड की कथा
महाभारत काल के दौरान पांडव अपने वनवास के दिनों में इस पवित्र तीर्थ पर आए थे। एक प्रमुख कथा राजा युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ से जुड़ी है। यज्ञ का घोड़ा जब इस क्षेत्र से गुजरा, तो स्थानीय राजा हंसध्वज ने उसे रोक लिया। यह युद्ध की चुनौती थी। हंसध्वज के दो पुत्र थे – सुरथ और सुधन्वा। युद्ध छिड़ गया और सुरथ अपने पिता के साथ युद्ध में कूद पड़ा।

लेकिन उनका छोटा पुत्र सुधन्वा इस युद्ध में अनुपस्थित था। वह माँ चंद्रिका देवी धाम में ही नौ दुर्गाओं की पूजा-आराधना में इतना लीन था कि उसे युद्ध की कोई सूचना तक नहीं मिली। युद्ध के बाद, उसकी इस अनुपस्थिति पर संदेह किया गया। उसकी निष्ठा और साहस की परीक्षा लेने के लिए उसे महिसागर क्षेत्र में खौलते तेल के एक विशाल कड़ाहे में डाल दिया गया। लेकिन माँ चंद्रिका देवी की कृपा से उसके शरीर पर खौलते तेल का जरा सा भी प्रभाव नहीं पड़ा। वह सुरक्षित बाहर निकल आया। तभी से इस पवित्र कुंड को सुधन्वा कुंड के नाम से जाना जाने लगा, जो आज भी मंदिर परिसर में विद्यमान है।
इस युद्ध के बाद, युधिष्ठिर की विशाल सेना (जिसे कटक कहा जाता था) ने यहाँ कुछ समय के लिए डेरा डाला। इसीलिए यह स्थान कटकवासा कहलाया, जो कालांतर में अपभ्रंश होकर कठवारा गाँव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
3. द्वापर युग: वीर बर्बरीक की तपस्या स्थली
स्कंद पुराण के अनुसार, द्वापर युग में घटोत्कच के पुत्र महाबली बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण की सलाह पर दिव्य शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए इसी महिसागर संगम तीर्थ पर तीन वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माँ चंद्रिका देवी ने उन्हें वरदान दिए थे। आज भी यहाँ देवी के साथ वीर बर्बरीक की पूजा की जाती है और मंदिर परिसर में बर्बरीक द्वार नामक स्थान दर्शनीय है, जहाँ उनकी तपस्या की स्मृति संजोई हुई है।
4. चंद्र देव की शाप मुक्ति
एक अन्य मान्यता यह भी है कि दक्ष प्रजापति के शाप से पीड़ित चंद्र देव (चंद्रमा) ने भी इसी महिसागर संगम के पवित्र जल में स्नान करके शाप से मुक्ति पाई थी। इसीलिए इस तीर्थ का संबंध चंद्र ग्रह से भी माना जाता है और माना जाता है कि यहाँ पूजा करने से चंद्र दोष से मुक्ति मिलती है।
मंदिर का इतिहास: विनाश और पुनर्निर्माण की गाथा
वर्तमान में जो भव्य मंदिर देखने को मिलता है, उसका इतिहास लगभग 250-300 वर्ष पुराना है। लेकिन इस स्थल की यात्रा इससे कहीं अधिक पुरानी और उथल-पुथल भरी है।
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प्राचीन मंदिर का विनाश: स्थानीय इतिहास और मौखिक परंपराओं के अनुसार, यहाँ एक भव्य और प्राचीन मंदिर हुआ करता था। लेकिन 12वीं शताब्दी के आसपास, विदेशी आक्रमणकारियों ने इस क्षेत्र पर हमला किया और इस पवित्र मंदिर सहित कई अन्य धार्मिक स्थलों को नष्ट कर दिया। मंदिर की मूर्तियाँ और ढाँचा तहस-नहस हो गया। इसके बाद लंबे समय तक यह स्थल घने जंगल और उपेक्षा में छिपा रहा।
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मूर्ति की पुनः प्राप्ति और मंदिर का पुनर्निर्माण: लगभग 18वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध (250-300 वर्ष पूर्व) की बात है। कुछ स्थानीय ग्रामीण इस घने जंगल से गुजर रहे थे कि उन्हें एक अद्भुत दिव्य अनुभूति हुई और उन्होंने इस गुप्त स्थान की खोज की। अगले दिन, एक ग्रामीण को जंगल में देवी की एक प्राचीन मूर्ति मिली। इसे दैवीय संकेत मानते हुए, ग्रामवासियों ने मिलकर उस मूर्ति को वर्तमान स्थल पर स्थापित किया। धीरे-धीरे, एक छोटे से मंदिर का निर्माण हुआ। समय के साथ, माँ की ख्याति फैलती गई और भक्तों की संख्या बढ़ती गई।
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वर्तमान स्वरूप: भक्तों के दान और श्रद्धा से मंदिर का विकास होता रहा। ठाकुर बेनी सिंह चौहान जैसे स्थानीय संरक्षकों ने इसे संगठित करने में अहम भूमिका निभाई। एक ऊँचे चबूतरे पर मुख्य मंदिर, यज्ञशाला, हवन कुंड आदि का निर्माण हुआ। आज उनके वंशज अखिलेश सिंह, जो कठवारा गाँव के प्रधान भी हैं, मंदिर और मेले के प्रबंधन की देखरेख करते हैं। इस प्रकार, यह मंदिर एक भक्ति आंदोलन और सामुदायिक सहयोग का जीवंत उदाहरण बनकर उभरा।
मंदिर परिसर के दर्शनीय स्थल
मंदिर परिसर एक विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है और यहाँ आने वाले भक्तों के लिए कई पवित्र और ऐतिहासिक स्थल देखने योग्य हैं:
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श्री चंद्रिका देवी का मुख्य गर्भगृह: यहाँ देवी की भव्य और श्रद्धा से सुसज्जित प्रतिमा विराजमान है। माँ की मूर्ति पर लगातार चढ़ाई गई चुनरियाँ उनकी अनंत कृपा और भक्तों की अटूट आस्था का प्रमाण हैं।
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सुधन्वा कुंड: पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ यह पवित्र कुंड आज भी मंदिर परिसर में स्थित है। भक्त यहाँ जल अर्पित करते हैं।
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बर्बरीक द्वार: वीर बर्बरीक की तपस्या स्थली को चिह्नित करता हुआ यह स्थान भक्तों को महाभारत काल की याद दिलाता है।
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महिसागर संगम तीर्थ के घाट: गोमती नदी और महिसागर के पवित्र संगम पर बने सुंदर घाट हैं, जहाँ भक्त स्नान, तर्पण और पूजा करते हैं। इन घाटों का ऐतिहासिक महत्व है।
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विशाल हवन कुंड एवं यज्ञशाला: यहाँ नियमित रूप से हवन और विशेष अवसरों पर बड़े यज्ञ सम्पन्न होते हैं। यज्ञशाला एक विशाल और सुव्यवस्थित स्थल है।
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नवदुर्गा वेदियाँ: प्राचीन नीम के वृक्ष के निकट स्थित नौ दुर्गाओं की पवित्र वेदियाँ। यह स्थान अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है।
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भैरवनाथ (पछुआ देव) का स्थान: मुख्य मंदिर के पश्चिम में स्थित, माना जाता है कि यहाँ का भैरव देव इस पूरे धाम की रक्षा करते हैं।
लखनऊ की कुलदेवी और सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण
माँ चंद्रिका देवी को न केवल लखनऊ की कुलदेवी माना जाता है, बल्कि वे कई राजपूत गोत्रों, विशेष रूप से प्रसिद्ध योद्धाओं आल्हा-ऊदल के चंदेल वंश की भी आराध्य देवी हैं। लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों में यह गहरी आस्था है कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करने से पहले, चाहे वह नया व्यवसाय हो, गृहप्रवेश हो या विवाह, माँ चंद्रिका देवी के दर्शन करने और आशीर्वाद लेने आना अनिवार्य है। इससे कार्य निर्विघ्न पूरा होता है।
इस मंदिर की सबसे अनूठी और प्रशंसनीय विशेषता यहाँ देखी जाने वाली सामाजिक समरसता और सहभागिता है। एक ही धार्मिक परिसर में विभिन्न समुदायों का सहज सहयोग देखने को मिलता है, जो एक आदर्श समाज का नमूना पेश करता है:
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मुख्य मंदिर की पूजा: मुख्य मंदिर में पूजा-अर्चना और देवी की सेवा का दायित्व माली समुदाय (पिछड़ा वर्ग) के लोगों द्वारा किया जाता है। यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।
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भैरवनाथ की पूजा: भैरवनाथ (पछुआ देव) के स्थान पर पूजा-अर्चना और आराधना का दायित्व अनुसूचित जाति के पासी समुदाय के लोगों द्वारा संपन्न कराया जाता है।
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संगम तीर्थ के पुरोहित: महिसागर संगम तीर्थ के घाट पर पूजन, तर्पण, पिंडदान आदि संस्कार ब्राह्मण पुरोहितों द्वारा कराए जाते हैं। यज्ञशाला के आचार्य भी ब्राह्मण हैं।
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प्रबंधन एवं संचालन: मंदिर के व्यापक प्रबंधन, मेलों की व्यवस्था और देखरेख का कार्य स्थानीय गाँव के प्रधान अखिलेश सिंह (ठाकुर बेनी सिंह चौहान के वंशज) के नेतृत्व में होता है।
यह व्यवस्था स्पष्ट करती है कि माँ चंद्रिका देवी के दरबार में जाति, वर्ग या हैसियत का कोई भेदभाव नहीं है। सबको समान दृष्टि से देखा जाता है और सबका सहयोग एक सुव्यवस्थित तीर्थ के संचालन के लिए आवश्यक माना जाता है। यह सहकार्य और समान अधिकार की भावना का एक दुर्लभ एवं प्रेरणादायक उदाहरण है।
मन्नतें, आराधना के विधि-विधान और श्रद्धा के रीति-रिवाज
भक्त यहाँ धन, समृद्धि, संतान सुख, विवाह में आ रुकावट दूर करने, नौकरी-व्यवसाय में सफलता और मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए आते हैं। मंदिर की कुछ विशेष परंपराएँ इस प्रकार हैं:
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चुनरी गाँठ बाँधना: श्रद्धालु अपनी मन्नत माँगने के लिए मंदिर में चुनरी (पवित्र वस्त्र) की गाँठ बाँधते हैं। यह गाँठ माँ से एक वचनबद्धता और अपनी श्रद्धा का प्रतीक है।
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मन्नत पूरी होने पर: जब भक्त की मनोकामना पूरी हो जाती है, तो वे माँ को नई चुनरी चढ़ाते हैं, प्रसाद (मुख्य रूप से बताशे, लड्डू आदि) वितरित करते हैं और मंदिर परिसर में घंटी बाँधते हैं। घंटी की आवाज़ को माँ की स्तुति और कृपा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
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संगम स्नान: महिसागर संगम में स्नान करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। विशेषकर अमावस्या, सूर्यग्रहण, कुंभ आदि विशेष अवसरों पर यहाँ स्नान का विशेष महत्व है।
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नवदुर्गा की पूजा: चूंकि यह नवदुर्गा सिद्धपीठ है, अतः यहाँ नौ दुर्गाओं की विशेष आराधना की जाती है। कई भक्त नौ शुक्रवार, नवरात्रि में नौ कन्याओं को भोजन कराकर या नौ रूपों की विशेष पूजा करके अपनी मनोकामना पूरी करते हैं।
विशेष पर्व, मेले और आयोजन
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अमावस्या: 300 वर्षों से अटूट परंपरा
प्रत्येक मास की अमावस्या यहाँ का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। 300 वर्षों से भी अधिक पुरानी परंपरा के अनुसार इस दिन यहाँ एक बड़ा मेला लगता है। इस मेले में हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। खास बात यह है कि लखनऊ के चौक क्षेत्र के भक्त बड़ी संख्या में दर्शन करने आते हैं। इसका उल्लेख प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार अमृतलाल नागर ने अपने उपन्यास ‘करवट’ में किया है। उपन्यास का नायक बंशीधर टंडन हर अमावस्या को चौक से ही यहाँ दर्शन करने आता था। आज भी यह परंपरा जीवित है। -
नवरात्रि: नौ दिन का महोत्सव
नवरात्रि के नौ दिन यहाँ विशेष आयोजन होते हैं। हवन (यज्ञ), मुंडन संस्कार, कीर्तन, सत्संग, जागरण और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इस दौरान यहाँ भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है और पूरा परिसर भक्ति रस में सराबोर हो जाता है। शारदीय और चैत्र नवरात्रि दोनों ही यहाँ बड़े उत्साह से मनाए जाते हैं। -
अन्य अवसर: मकर संक्रांति, सूर्यग्रहण, दीपावली, शिवरात्रि आदि पर्वों पर भी यहाँ विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है।
प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1: माँ चंद्रिका देवी मंदिर कहाँ स्थित है?
A1: माँ चंद्रिका देवी मंदिर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लगभग 28 किमी दूर, बख्शी का तालाब क्षेत्र के निकट कठवारा गाँव में स्थित है। यह गोमती नदी के तट पर है।
Q2: माँ चंद्रिका देवी मंदिर तक कैसे पहुँचा जा सकता है?
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सड़क मार्ग: लखनऊ से बख्शी का तालाब होते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग 24 (लखनऊ-सीतापुर रोड) पर यह मार्ग जाता है। बस, ऑटो, टैक्सी या निजी वाहन से आसानी से पहुँचा जा सकता है।
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रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन लखनऊ जंक्शन है। वहाँ से टैक्सी लेकर आ सकते हैं।
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वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा लखनऊ का चौधरी चरण सिंह अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो यहाँ से लगभग 45 किमी दूर है।









