भूमि सुधार और नारी सशक्तिकरण 2025: मोदी सरकार के ये दो बड़े फैसले बदल देंगे भारत की आर्थिक तस्वीर

भारत एक बार फिर से ऐतिहासिक आर्थिक और सामाजिक बदलाव के मुहाने पर खड़ा है। जिस तरह जीएसटी (GST) ने पूरे देश को एक कर व्यवस्था के तहत पिरोकर ‘एक राष्ट्र, एक बाजार’ का सपना साकार किया, उसी तर्ज पर अब सरकार दो और क्रांतिकारी सुधारों पर तेजी से काम कर रही है। ये सुधार हैं – भूमि सुधार और महिला आर्थिक सशक्तिकरण। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये दोनों योजनाएं सही ढंग से और पूरी तत्परता के साथ लागू हो जाती हैं, तो ये न केवल देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगी, बल्कि हमारे समाज की बुनियाद को भी मजबूत करेंगे। यह लेख इन्हीं दोनों महत्वाकांक्षी परियोजनाओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

1: भारत की सदियों पुरानी समस्या – जमीन के जटिल विवाद और उसका आर्थिक प्रभाव

भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है, और यहाँ जमीन को सिर्फ एक संपत्ति नहीं, बल्कि सम्मान और पहचान का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन विडंबना यह है कि इसी जमीन को लेकर देश में सबसे अधिक विवाद और मुकदमेबाजी होती है।

मुख्य समस्याएँ क्या हैं?

  1. अनगिनत मुकदमे और अपराध: देश की अदालतों में लंबित दीवानी मामलों का एक बहुत बड़ा हिस्सा जमीन विवादों से जुड़ा हुआ है। ये विवाद अक्सर पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलते हैं और कई बार हिंसक होकर फौजदारी अपराधों का रूप ले लेते हैं। इन मुकदमों पर न केवल लोगों का पैसा और समय बर्बाद होता है, बल्कि न्यायपालिका पर भी एक अतिरिक्त बोझ बना रहता है।

  2. विकास में सबसे बड़ी बाधा: किसी भी बुनियादी ढाँचा परियोजना, उद्योग, या निवेश के लिए सबसे पहले जमीन की आवश्यकता होती है। अगर जमीन के मालिकाना हक स्पष्ट नहीं हैं, तो परियोजनाएं महीनों, यहाँ तक कि सालों तक अटकी रहती हैं। इससे ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ खराब होती है और देश के आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ जाती है।

  3. जमीन की कीमतों में मनमानी और अस्थिरता: भारत में जमीन की कीमतों का अक्सर कोई वैज्ञानिक या पारदर्शी आधार नहीं होता। कालाबाजारी, सट्टेबाजी और गलत जानकारी के चलते कीमतें आसमान छूती हैं। इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है, जिसके लिए अपना घर खरीदना सपना बनकर रह जाता है। रियल एस्टेट सेक्टर में यह अस्थिरता निवेशकों के लिए भी एक बड़ा जोखिम बन जाती है।

2: सरकार का कारगर समाधान – डिजिटलाइजेशन से ‘एक देश, एक जमीन रिकॉर्ड’ की ओर

भारत में जमीन का मालिकाना हक और रजिस्ट्रेशन एक ऐसी पहेली है, जिसमें देश की न्याय व्यवस्था दशकों से उलझी हुई है। हालत यह है कि देश की अदालतों में सबसे ज्यादा मुकदमे “नाली, खरंजे और मेड़” जैसे छोटे-छोटे भूमि विवादों से जुड़े हैं। हर राज्य, जिले और तहसील में अलग-अलग नियम होने के कारण घर बनाना, बिजनेस शुरू करना या निवेश करना एक बड़ी चुनौती है।

समस्या क्या है?

  • अनगिनत मुकदमे: दीवानी मामलों का एक बड़ा हिस्सा जमीन विवादों का है, जो अक्सर फौजदारी अपराधों में बदल जाते हैं।
  • विकास में बाधा: स्पष्ट मालिकाना हक न होने से प्रोजेक्ट्स में देरी होती है और आर्थिक विकास रुक जाता है।
  • कीमतों में मनमानी: जमीन की कीमतों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, जिससे रियल एस्टेट सेक्टर में अस्थिरता बनी रहती है।

इन समस्याओं के समाधान के लिए सरकार पिछले कुछ वर्षों से लगातार काम कर रही है। डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (DILRMP) की बदौलत देश के लगभग 95% भूमि रिकॉर्ड्स को डिजिटल कर दिया गया है। यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन अब सरकार इससे भी एक कदम आगे बढ़ रही है।

भू-आधार (ULPIN) – जमीन का आधार कार्ड:

सरकार की सबसे बड़ी और क्रांतिकारी पहल है यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (ULPIN) या ‘भू-आधार’। इसे समझना बहुत आसान है। जिस तरह हर भारतीय नागरिक का एक unique आधार नंबर होता है, उसी तरह अब देश में जमीन के हर टुकड़े को एक 14-अंकों का विशिष्ट नंबर दिया जाएगा। यह नंबर उस जमीन के लिए एक डिजिटल पहचान पत्र की तरह काम करेगा।

यह कैसे काम करेगा?
इस नंबर को जेनरेट करने के लिए जमीन के जियो-स्पेशल को-ऑर्डिनेट्स (भौगोलिक स्थिति) का इस्तेमाल किया जाएगा। इसका मतलब है कि हर प्लॉट की अपनी एक अलग और अद्वितीय पहचान होगी, जिसे किसी और प्लॉट के साथ मिलाया नहीं जा सकेगा। इससे “एक देश, एक जमीन रिकॉर्ड” की अवधारणा को बल मिलेगा।

स्वामित्व स्कीम – गरीबों को उनके हक दिलाना:
सिर्फ रिकॉर्ड्स डिजिटल करने से ही काम नहीं चलता। देश के ग्रामीण और वनवासी इलाकों में लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पास अपनी जमीन के कानूनी दस्तावेज नहीं हैं। ‘स्वामित्व योजना’ का उद्देश्य ऐसे ही लोगों को उनकी जमीन का पक्का मालिकाना हक (टाइटल डीड) प्रदान करना है। इससे न केवल उन्हें सामाजिक सुरक्षा मिलेगी, बल्कि वे अपनी जमीन को गिरवी रखकर बैंकों से ऋण भी ले सकेंगे, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी।

3: भू-सुधारों का आपके जीवन और देश की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

अगर भूमि सुधार पूरी तरह से लागू हो जाते हैं, तो इसके दूरगामी सकारात्मक परिणाम होंगे।

  • जमीन की कीमतों में 25% तक की गिरावट: प्रतिष्ठित कंसल्टेंसी फर्म मैकिन्ज़ी की एक रिपोर्ट के अनुसार, पारदर्शी और केंद्रीकृत भूमि रिकॉर्ड व्यवस्था से देश में जमीन की कीमतें 25% तक गिर सकती हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि जब हर चीज स्पष्ट और डिजिटल होगी, तो सट्टेबाजी और कालाबाजारी पर लगाम लगेगी। जमीन की कीमतें उसके वास्तविक बाजार मूल्य के करीब आ जाएंगी।

  • सस्ता और सुलभ आवास: जमीन सस्ती होगी तो बिल्डर्स के लिए निर्माण लागत घटेगी, जिसका सीधा फायदा आम खरीदार को मिलेगा। घर खरीदना पहले से कहीं अधिक सस्ता और आसान हो जाएगा।

  • निवेश में वृद्धि: निवेशकों को जमीन खरीदने और उस पर परियोजनाएं शुरू करने में आसानी होगी। मुकदमेबाजी का डर कम होगा, जिससे देश और विदेश से निवेश बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

  • कृषि में सुधार: किसानों को स्पष्ट मालिकाना हक मिलने से वे आधुनिक तकनीकों में निवेश कर पाएंगे और बैंकों से आसानी से ऋण ले सकेंगे।

4: दूसरा इंजन – महिला शक्ति से दौड़ेगी भारत की जीडीपी

भारत की तरक्की का दूसरा सबसे बड़ा इंजन देश की आधी आबादी, यानी महिलाएं हैं। अर्थशास्त्र की भाषा में कहें तो यह एक ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ है जिसका हम अभी तक पूरा फायदा नहीं उठा पाए हैं।

भूमि सुधार और नारी सशक्तिकरण 2025
भूमि सुधार और नारी सशक्तिकरण 2025

चिंताजनक स्थिति:
भारत की कुल श्रमशक्ति (वर्कफोर्स) में महिलाओं की भागीदारी मात्र 33% के आसपास है। यह आंकड़ा वैश्विक मानकों के मुकाबले बहुत कम है। चीन और अमेरिका जैसे देशों में यह भागीदारी 55% से 60% के बीच है। इसका सीधा सा मतलब है कि हम अपनी कुल उत्पादक क्षमता का एक बहुत बड़ा हिस्सा बिना इस्तेमाल के छोड़ रहे हैं।

आईएमएफ की भविष्यवाणी:
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की पूर्व प्रमुख क्रिस्टीन लगार्ड ने एक बार कहा था कि अगर भारत में महिलाओं की श्रमशक्ति भागीदारी पुरुषों के बराबर, यानी लगभग 50% हो जाए, तो इससे देश की जीडीपी में 50% तक की अभूतपूर्व वृद्धि हो सकती है। यह कोई छोटा-मोटा आंकड़ा नहीं है; यह देश की अर्थव्यवस्था के आकार को दोगुना करने जैसा है।

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महिलाओं के सामने मुख्य चुनौतियाँ:

  • गहरी जड़ें जमाए सामाजिक बाधाएं: पारंपरिक सोच, परिवार की जिम्मेदारियाँ, और सुरक्षा संबंधी चिंताएं महिलाओं को नौकरी या व्यवसाय शुरू करने से रोकती हैं।

  • वित्तीय असहायता: बहुत सी महिलाओं के पास अपने वित्तीय फैसले खुद लेने की आजादी नहीं होती। बैंक खाते, संपत्ति के दस्तावेज अक्सर पुरुषों के नाम पर होते हैं, जिससे उनकी वित्तीय स्वायत्तता सीमित हो जाती है।

5: महिला सशक्तिकरण की ओर सरकार की रणनीतिक पहल

सरकार ने इस दिशा में पहले से ही कई ठोस कदम उठाए हैं, जो महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बना रहे हैं।

  • प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY): इस योजना के तहत बनने वाले घरों का रजिस्ट्रेशन महिलाओं के नाम पर या उनके साथ संयुक्त रूप से किया जा रहा है। इससे न केवल महिलाओं में संपत्ति के अधिकार की भावना पैदा हो रही है, बल्कि परिवार के भीतर उनकी स्थिति भी मजबूत हुई है।

  • प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY): इस योजना के तहत खोले गए 70% से अधिक बैंक खाते महिलाओं के नाम हैं। इसने उन्हें वित्तीय समावेशन की मुख्यधारा से जोड़ा है और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे उनके खाते में पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया है।

  • मुद्रा योजना: इस योजना के तहत दिए जाने वाले ऋणों का एक बड़ा हिस्सा महिला उद्यमियों को गया है, जिससे उन्होंने अपना छोटा व्यवसाय शुरू करने में मदद मिली है।

अगला कदम: NPS सखी और वित्तीय साक्षरता
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में ‘NPS सखी’ जैसी एक नई पहल का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत महिलाएं पेंशन उत्पादों (NPS) को बेचने और वित्तीय साक्षरता फैलाने में एक अग्रणी भूमिका निभाएंगी। इसके दोहरे फायदे होंगे: एक तरफ तो महिलाओं को रोजगार और उद्यमिता का मौका मिलेगा, दूसरी तरफ देश की अन्य महिलाएं वित्तीय रूप से साक्षर और भविष्य के लिए सुरक्षित हो सकेंगी। सरकार का फोकस सिर्फ महिलाओं को नौकरी दिलाने पर नहीं, बल्कि उन्हें वित्तीय रूप से स्वतंत्र और सशक्त बनाने पर है।

निष्कर्ष: एक नए भारत की नींव

भूमि सुधार और महिला सशक्तिकरण – ये दोनों ही सुधार एक-दूसरे के पूरक हैं। एक तरफ जहाँ भूमि सुधार देश में निवेश और विकास के लिए एक मजबूत बुनियादी ढाँचा तैयार कर रहा है, वहीं महिला सशक्तिकरण यह सुनिश्चित कर रहा है कि इस विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक समान रूप से पहुँचे।

अगर यह दोहरी रणनीति सफल होती है, तो भारत न केवल एक $5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने के अपने लक्ष्य को जल्दी प्राप्त कर लेगा, बल्कि एक न्यायसंगत, समावेशी और विकसित राष्ट्र के रूप में भी दुनिया के सामने एक मिसाल पेश करेगा। यह सिर्फ आर्थिक आंकड़ों में बदलाव की बात नहीं है, बल्कि एक नए, आत्मनिर्भर और सशक्त भारत के निर्माण की ओर एक ऐतिहासिक कदम है।

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