बिहार का चारा घोटाला – एक ऐसा राजनीतिक भूचाल जिसने लालू को पहुंचाया जेल, 950 करोड़ की हुई थी लूट और CBI के 20 ट्रक दस्तावेजों ने खोला राज!

बिहार के राजनीतिक इतिहास में ‘चारा घोटाला’ (Fodder Scam) वह काले अक्षर हैं, जो सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और न्याय के लंबे संघर्ष की कहानी कहते हैं। यह सिर्फ 950 करोड़ रुपये का वित्तीय घोटाला भर नहीं था, बल्कि एक ऐसा भूचाल था जिसने एक ताकतवर राजनीतिक साम्राज्य की नींव हिला कर रख दी। इसकी जड़ें 1970 के दशक तक जाती हैं और इसकी गूंज आज भी सुनाई देती है।

 

घोटाले की उत्पत्ति: 1970s का दशक

यह सब बिहार के पशुपालन विभाग (Animal Husbandry Department) में शुरू हुआ। एक व्यवस्थित तरीके से, विभागीय अधिकारियों और राजनेताओं की सांठगांठ से सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनी। इसका मॉडल सीधा था: पशुओं के चारे (Fodder), दवाइयों और articificial insemination जैसी चीजों की झूठी खरीद के बिल बनाना। ये बिल अक्सर काल्पनिक आपूर्तिकर्ताओं (suppliers) के नाम पर होते थे। इन झूठे बिलों पर जारी किए गए चेक, बिहार के विभिन्न जिलों के छोटे-छोटे बैंक शाखाओं से भुना दिए जाते थे। हैरानी की बात यह है कि यह सिलसिला बगैर किसी रोक-टोक के दो दशकों तक चलता रहा।

 

चारा घोटाला पर चेतावनी के संकेत: CAG और सतर्कता विभाग

1985 में, तत्कालीन नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) टी.एन. चतुर्वेदी ने एक ऑडिट रिपोर्ट में बिहार सरकार को चेताया कि पशुपालन विभाग में व्यय की प्रक्रिया गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण है और बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के संकेत हैं। हालाँकि, इस चेतावनी को राज्य सरकार द्वारा गंभीरता से नहीं लिया गया।

1992 में, बिहार सरकार के सतर्कता विभाग (Vigilance Department) के एक निरीक्षक, बिधु भूषण द्विवेदी ने इस मामले की एक गुप्त रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट में पहली बार सीधे तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के करीबी लोगों और नौकरशाहों पर आरोप लगाए गए। कहा जाता है कि इस रिपोर्ट को दबाने की कोशिश की गई और द्विवेदी का तबादला कर दिया गया।

 

मीडिया का बड़ा खुलासा: रवि एस. झा

जनवरी 1996 में, बिहार के पत्रकार रवि एस. झा ने इस घोटाले का पर्दाफाश किया। उनकी खोजी रिपोर्टिंग में सामने आया कि सिर्फ एक वित्तीय वर्ष (1994-95) में ही पशुपालन विभाग से लगभग 950 करोड़ रुपये की बेहद शंकास्पद निकासी हुई थी। यह खबर एक बम की तरह फटी और राष्ट्रीय मीडिया की हेडलाइन बन गई। लालू प्रसाद यादव, जो उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे, सीधे निशाने पर आ गए।

 

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CBI जांच और राजनीतिक भूचाल

दबाव के कारण, बिहार सरकार ने मामले की जांच CBI को सौंप दी। CBI ने ‘चारा घोटाला’ को कई अलग-अलग मामलों (RCs) में बांटा। कहा जाता है कि सबूत जुटाने के लिए CBI को घोटाले से जुड़े दस्तावेजों के 20 ट्रक भरने पड़े! जांच में पाया गया कि यह एक विशाल सिंडिकेट था, जिसमें नौकरशाह, राजनेता और ठेकेदार शामिल थे।

मार्च 1996 में, लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन उन्होंने सत्ता अपने हाथ से नहीं जाने दी। उन्होंने अपनी पत्नी, राबड़ी देवी, को मुख्यमंत्री बना दिया, जो एक गृहिणी थीं। यह एक अभूतपूर्व राजनीतिक कदम था, जिसे सत्ता बचाने की कोशिश के तौर पर देखा गया।

 

गिरफ्तारी, मुकदमे और सजा

जुलाई 1997 में, CBI ने लालू प्रसाद यादव को गिरफ्तार किया। उन्हें रांची जेल भेज दिया गया। इसके बाद उन पर और उनके परिवार पर आय से अधिक संपत्ति (Disproportionate Assets) का अलग मुकदमा भी दर्ज हुआ।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, सितंबर 2013 में, CBI की एक विशेष अदालत (रांची) ने लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले के एक मामले (RC 20A/96) में दोषी ठहराया और उन्हें 5 साल की जेल की सजा सुनाई। सजा के कारण, उनकी लोकसभा सदस्यता स्वतः ही खत्म हो गई और उन पर भविष्य में चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लग गया (भारतीय जनता प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 के तहत)। उन्हें जेल जाना पड़ा।

 

व्यापक प्रभाव और निष्कर्ष

‘चारा घोटाला’ के दूरगामी परिणाम हुए:

  1. राजनीतिक पतन: लालू प्रसाद यादव की ‘जनता दल’ की सरकार अंततः गिर गई और बिहार की राजनीति में एक नया दौर शुरू हुआ।

  2. नौकरशाही में सफाई: इस घोटाले में सैकड़ों नौकरशाह और अधिकारी आएदोज हुए, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था में एक झटका लगा।

  3. CBI की भूमिका: इस मामले ने CBI की स्वायत्तता और उसकी जांच के तरीकों को केंद्र में ला दिया।

  4. न्यायिक प्रक्रिया: यह मामला भारतीय न्यायपालिका में लंबे समय तक चलने वाले और जटिल मुकदमों का प्रतीक बन गया।

हालांकि लालू प्रसाद यादव को कुछ मामलों में बाद में जमानत मिल गई और वे राजनीति में वापस लौटे, लेकिन ‘चारा घोटाला’ उनके और बिहार की राजनीति के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया है। यह घोटाला भारतीय लोकतंत्र में सिस्टम के भीतर मौजूद गहरे भ्रष्टाचार और अंततः न्याय की जीत की एक जटिल, लेकिन सबक सिखाने वाली कहानी है।

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