भारतीय इतिहास में कुछ ऐसे महान व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने न केवल अपने समय को प्रभावित किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक नई राह प्रशस्त की। ऐसे ही एक क्रांतिकारी समाज सुधारक, विचारक और नेता थे ई.वी. रामासामी, जिन्हें पूरी दुनिया ‘पेरियार’ (महान व्यक्ति) के नाम से जानती है। 17 सितंबर, 1879 को तमिलनाडु के इरोड शहर में जन्मे और 24 दिसंबर, 1973 को दुनिया को अलविदा कहने वाले पेरियार के विचार आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं।

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
पेरियार का जन्म एक धनी और प्रभावशाली परिवार में हुआ था। उनके पिता वेंकटप्पा नायडू एक सफल व्यवसायी थे। बचपन से ही पेरियार ने समाज में फैली जातिगत असमानता और धार्मिक अंधविश्वासों को करीब से देखा। उनकी शिक्षा-दीक्षा स्थानीय स्कूलों में हुई, लेकिन औपचारिक शिक्षा से ज्यादा वे समाजिक विषमताओं को समझने में रुचि रखते थे।
वैवाहिक जीवन
1896 में पेरियार का विवाह नागम्मई से हुआ। इस संबंध से उन्हें एक पुत्री की प्राप्ति हुई, लेकिन दुर्भाग्यवश अल्पआयु में ही उसकी मृत्यु हो गई। 1933 में नागम्मई का भी निधन हो गया। 1948 में, 70 वर्ष की आयु में पेरियार ने मनियम्मई से दूसरा विवाह किया। मनियम्मई न केवल उनके जीवनसाथी बनीं, बल्कि पेरियार की मृत्यु के बाद भी उन्होंने द्रविड़ कड़गम के सामाजिक कार्यों को आगे बढ़ाया और उनकी विरासत को जीवित रखा।

राजनीतिक यात्रा: कांग्रेस से अलगाव तक
पेरियार ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1919 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होकर की। 1922 में वे मद्रास प्रेसीडेंसी कांग्रेस समिति के अध्यक्ष चुने गए। हालाँकि, जल्द ही उन्होंने महसूस किया कि कांग्रेस जातिगत भेदभाव और रूढ़िवादिता से मुक्त नहीं है। 1925 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और ‘स्वाभिमान आंदोलन’ (Self-Respect Movement) की नींव रखी। इस आंदोलन का उद्देश्य दलितों और पिछड़े वर्गों के लोगों में आत्म-गौरव और आत्म-निर्भरता की भावना विकसित करना था।
वैक्कम सत्याग्रह: सामाजिक न्याय की पहली लड़ाई
1924 में केरल के वैक्कम में एक ऐतिहासिक आंदोलन हुआ, जहाँ निचली जातियों के लोगों को मंदिर की मुख्य सड़कों से गुजरने की मनाही थी। पेरियार ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और वैक्कम सत्याग्रह का नेतृत्व किया। इस आंदोलन ने न केवल दक्षिण भारत बल्कि पूरे देश में सामाजिक न्याय की नई बहस छेड़ दी।
तर्कवाद और धार्मिक आलोचना
पेरियार की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी तर्कवादी सोच (Rationalism)। वे हमेशा कहते थे, “किसी भी बात को अंधविश्वास की वजह से मत मानो। उस पर सवाल करो, तर्क करो और अगर वह तर्क से सही साबित होती है, तभी मानो।” उन्होंने धर्म और ईश्वर के नाम पर होने वाले शोषण का जमकर विरोध किया। उनकी सबसे चर्चित और विवादास्पद कृति ‘सच्ची रामायण’ थी, जिसमें उन्होंने रामायण की आलोचनात्मक व्याख्या की।
पेरियार ने तर्कवाद (Rationalism) को अपने आंदोलन का मुख्य आधार बनाया। उनका मानना था कि बिना तर्क और विवेक के किसी भी बात को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं की कटु आलोचना की, जिन्हें वह सामाजिक असमानता का कारण मानते थे। उनकी सबसे चर्चित और विवादास्पद कृति ‘सच्ची रामायण’ थी, जिसमें उन्होंने रामायण की एक आलोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत की।
द्रविड़ आंदोलन और राजनीतिक विरासत
1938 में पेरियार ने द्रविड़ कड़गम (Dravidar Kazhagam) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य द्रविड़ भाषा, संस्कृति और पहचान को संरक्षित करना था। इस आंदोलन ने तमिलनाडु की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। बाद में इसी movement से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) जैसी प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का उदय हुआ।

पेरियार का जीवन और योगदान (संक्षेप में सही क्रम में)
- 1919: पेरियार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए।
- 1922: वे मद्रास प्रेसीडेंसी कांग्रेस समिति के अध्यक्ष बने।
- 1924: पेरियार ने वैकाम सत्याग्रह में भाग लिया, जो केरल में मंदिर की सड़कों पर अछूतों के प्रवेश अधिकार से जुड़ा आंदोलन था।
- 1925: कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर उन्होंने आत्मसम्मान आंदोलन (Self-Respect Movement) शुरू किया।
- 1929: उन्होंने अपने नाम से “नायकर” उपनाम हटा दिया।
- 1938: पेरियार ने “तमिलनाडु फॉर तमिल्स” (तमिलों के लिए तमिलनाडु) का नारा दिया।
- 1944: उन्होंने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़ कड़गम (Dravidar Kazhagam) रखा।
- उनका संबोधन: उनके प्रशंसक उन्हें “पेरियार” कहते थे, जिसका अर्थ है – सम्मानित/महान व्यक्ति।
विचारधारा:
- उन्हें “एशिया का सुकरात” कहा गया।
- वे ब्राह्मणवाद के प्रखर विरोधी थे।
- रावण को वे अपना नायक मानते थे, क्योंकि वे आर्य-संस्कृति के वर्चस्व के आलोचक थे।
- उन्होंने बाल विवाह, देवदासी प्रथा, महिलाओं और दलितों पर हो रहे शोषण के खिलाफ संघर्ष किया।
- उन्होंने सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण का प्रस्ताव रखा।
NOTE– “1945 में पिता से अनबन के चलते घर छोड़ दिया” लिखा है, लेकिन यह तथ्य पेरियार से नहीं, बल्कि उनके पहले जीवन के किस्सों से भ्रमित लगता है। पेरियार ने वास्तव में बहुत पहले ही पारिवारिक व्यवसाय छोड़ दिया था और समाज सुधार के कार्यों में लग गए थे।
सुप्रीम कोर्ट और रामायण पर विवाद
पेरियार के विचारों ने कानूनी दुनिया में भी हलचल पैदा की। 1976 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘सच्ची रामायण’ मामले में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में फैसला सुनाया और इसे एक काल्पनिक ग्रंथ माना। वहीं 2019 के अयोध्या फैसले में कोर्ट ने वाल्मीकि रामायण और स्कंद पुराण के धार्मिक महत्व को स्वीकार किया। यह विरोधाभास पेरियार के विचारों की जटिलता और प्रासंगिकता को दर्शाता है।
शैक्षिक और सामाजिक योगदान
पेरियार ने शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने महिला शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और नास्तिकता को बढ़ावा दिया। उनका मानना था कि शिक्षा ही वह माध्यम है जो समाज को जातिगत बंधनों से मुक्त कर सकती है।
वैश्विक प्रभाव
1930 में पेरियार सोवियत रूस की यात्रा पर गए, जहाँ उन्होंने समाजवादी व्यवस्था का अध्ययन किया। इस यात्रा ने उनके सामाजिक और आर्थिक विचारों को गहराई से प्रभावित किया।
विरासत और समकालीन प्रासंगिकता
पेरियार की विरासत आज भी तमिलनाडु और देशभर में जीवित है। उनके “पूछो, सवाल करो, तर्क करो!” के मंत्र ने लाखों लोगों को प्रभावित किया। तमिलनाडु में सामाजिक न्याय, शिक्षा और समानता की मजबूत नींव पेरियार के विचारों की ही देन है।
पेरियार के 15 विचार जो समाज को नई दिशा देते हैं
1. उन्होंने हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ने और राम जैसे देवताओं की तस्वीरें जलाने की बात कही, और इसे जनता में जागृति का संकेत माना।
2. उन्होंने दुनिया के सभी संगठित धर्मों से अपनी सख्त नफरत जताई।
3. उनका मानना था कि धार्मिक ग्रंथ (शास्त्र-पुराण) और देवता दोषपूर्ण हैं, और उन्होंने लोगों से उन्हें नष्ट करने का आह्वान किया।
4. उनके आंदोलन का मुख्य लक्ष्य ब्राह्मणवाद और वर्ण व्यवस्था को खत्म करना था, जो समाज को जातियों में बाँटती है।
5. उन्होंने ब्राह्मणों पर आरोप लगाया कि वे अंधविश्वास फैलाकर खुद आराम से रहते हैं और दूसरों को ‘अछूत’ कहकर नीचा दिखाते हैं।
6. उनका विश्वास था कि ब्राह्मणों ने शास्त्रों, मंदिरों और देवताओं का निर्माण अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए किया।
7. उन्होंने सवाल किया कि अगर सभी इंसान एक समान पैदा हुए हैं, तो केवल ब्राह्मणों को ही ऊँचा और दूसरों को नीचा क्यों कहा जाता है।
8. उन्होंने लोगों से पूछा कि वे अपनी मेहनत की कमाई मंदिरों में क्यों लुटाते हैं, जबकि ब्राह्मणों ने खुद कभी दान नहीं दिया।
9. उनके लिए असली आज़ादी तब होगी जब लोग देवताओं, अंधविश्वास और जाति व्यवस्था से मुक्त हो जाएँगे।
10. उन्होंने आधुनिक विज्ञान के युग में श्राद्ध जैसे रीति-रिवाजों पर तर्क करते हुए उन्हें अतार्किक बताया।
11. उनका मानना था कि नास्तिक होने के लिए साहस और बुद्धि की ज़रूरत होती है, जबकि ईश्वर पर विश्वास करना आसान है।
12. उन्होंने लोगों से ब्राह्मणों के पैरों में गिरने या मंदिर-त्योहारों में समय बर्बाद करने के बजाय बुद्धिमानी से काम लेने को कहा।
13. उन्होंने हिंदू देवताओं के हथियारों वाले चित्रण पर सवाल उठाए और पूछा कि वे आधुनिक हथियार क्यों नहीं रखते।
14. उन्होंने आधुनिक युग (परमाणु युग) में पुराने देवताओं पर विश्वास करने पर लोगों को शर्मिंदा होने को कहा।
15. उनका आह्वान था कि उन देवताओं और ग्रंथों को नष्ट कर दो जो तुम्हें ‘शूद्र’ कहते हैं, और उस देवता की पूजा करो जो वास्तव में दयालु और तार्किक है।
निष्कर्ष
पेरियार सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक विचारधारा थे। उन्होंने जातिवाद, धार्मिक कट्टरता और सामाजिक अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। आज भी उनके विचार समाज में हो रहे बदलावों की राह दिखा रहे हैं। पेरियार का जीवन और संघर्ष हमें यह सिखाता है कि तर्क, विवेक और साहस के साथ खड़े होकर हम एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकते हैं।









