नवरात्रि 2025 में बन रहा है अद्भुत संयोग, नवरात्रि क्यों मनाई जाती है?! जानें कैसे पाएं मां दुर्गा की विशेष कृपा

नवरात्रि 2025: नवरात्रि हिंदू धर्म का एक ऐसा पर्व है जो सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि शक्ति, आस्था और आत्मशुद्धि का अनूठा संगम है। ‘नवरात्र’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘नौ रातें’। इन नौ रातों और दस दिनों तक देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह पर्व नौ दिनों तक ही क्यों मनाया जाता है? इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं और गहन आध्यात्मिक रहस्य छिपे हैं। चलिए हम सब, नवरात्रि की असली कहानी और उसके महत्व को विस्तार से जानते हैं।

नवरात्रि 2025
नवरात्रि 2025

 

नवरात्रि क्यों मनाई जाती है? दो प्रमुख पौराणिक कथाएं

नवरात्रि के महत्व को समझने के लिए मुख्य रूप से दो कथाएं प्रचलित हैं, जो इस पर्व के आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दोनों पहलुओं को उजागर करती हैं।

1. देवी दुर्गा और महिषासुर का महायुद्ध

यह सबसे प्रसिद्ध कथा है जो नवरात्रि के उत्सव का मूल आधार मानी जाती है। कथा के अनुसार, महिषासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया कि कोई भी देवता, यक्ष, गंधर्व या मनुष्य उसे मार नहीं सकेगा। इस अमोघ वरदान के मद में चूर होकर उसने स्वर्ग लोक पर आक्रमण कर दिया और देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया।

सभी देवता इस संकट से मुक्ति पाने के लिए त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश – के पास पहुंचे। देवताओं की व्यथा सुनकर तीनों देवताओं के तेज से एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई, जो देवी दुर्गा के रूप में सामने आईं। सभी देवताओं ने उन्हें अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए।

इसके बाद देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच भीषण युद्ध शुरू हुआ। यह संघर्ष पूरे नौ दिन और नौ रातों तक चला। अंततः, दशमी के दिन, जिसे विजयादशमी या दशहरा कहते हैं, देवी ने महिषासुर का वध कर धर्म की रक्षा की और संपूर्ण ब्रह्मांड को उसके आतंक से मुक्त कराया। इस विजय के उपलक्ष्य में ही देवी की शक्ति का पर्व ‘नवरात्रि’ मनाने की शुरुआत हुई।

2. भगवान राम और रावण का युद्ध: विजय के लिए दुर्गा पूजन

एक दूसरी प्रमुख कथा भगवान राम से जुड़ी है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, जब भगवान राम लंका पर चढ़ाई करने के लिए और सीता जी को मुक्त कराने के लिए तैयार हो रहे थे, तब उनके सामने एक बड़ी चुनौती थी – बलशाली रावण और उसकी विशाल सेना को हराना। रावण को पराजित करने के लिए दिव्य शक्ति की आवश्यकता थी।

ब्रह्मा जी ने श्री राम को सलाह दी कि वे लंका युद्ध से पहले देवी दुर्गा (जिन्हें यहाँ चंडी देवी भी कहा गया है) की विधिवत पूजा करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। उन्होंने बताया कि पूजा तभी सफल मानी जाएगी जब 108 नील कमलों से देवी की आराधना की जाए।

श्री राम ने अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक देवी की पूजा शुरू की। हवन आदि सभी विधियां पूर्ण हुईं, लेकिन जब 108 कमल चढ़ाने का समय आया तो पता चला कि केवल 107 कमल ही उपलब्ध हैं। मान्यता है कि रावण ने अपनी मायावी शक्ति से एक कमल गायब कर दिया था।

पूजा को अधूरा नहीं छोड़ा जा सकता था। तब भगवान राम ने यह निश्चय किया कि वे अपनी एक आंख (जिन्हें ‘कौमुदिनी लोचन’ कहा जाता है) देवी को अर्पित कर देंगे, क्योंकि उनकी आंखें कमल के समान ही सुंदर थीं। जैसे ही उन्होंने तीर से अपनी आंख निकालने का प्रयास किया, देवी दुर्गा प्रकट हुईं और उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया। माना जाता है कि इसके बाद ही दशमी के दिन रावण पर विजय प्राप्त हुई। इसीलिए, भगवान राम को नवरात्रि व्रत रखने वाले पहले भक्त के रूप में भी जाना जाता है।

नवरात्रि 2025
नवरात्रि 2025

 

नौ दिनों का रहस्य: संख्या का महत्व और देवी के नौ स्वरूप

नवरात्रि के नौ दिनों का चुनन केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। हिंदू धर्म में नौ का अंक बहुत ही पवित्र और पूर्णता का प्रतीक माना गया है।

  • नौ ग्रह: ज्योतिष में नौ ग्रह माने गए हैं, जो मनुष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं। इन नौ दिनों में देवी की उपासना करके इन ग्रहों के दोषों को शांत किया जा सकता है।

  • नौ रात्रियां: रात्रि को सकारात्मक ऊर्जा और शक्ति का समय माना गया है। देवी, जो स्वयं शक्ति हैं, की आराधना के लिए रात्रि का समय विशेष फलदायी है।

  • देवी के नौ स्वरूप: नवरात्रि का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है मां दुर्गा के नौ विभिन्न स्वरूपों की पूजा। प्रत्येक दिन देवी के एक विशेष रूप की उपासना की जाती है, जो जीवन के अलग-अलग पहलुओं को दर्शाते हैं।

 


शारदीय नवरात्रि 2025: 10 दिनों तक चलेगा महापर्व, जानें पूरी विधि और खास योग

     शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व सनातन धर्म में विशेष महत्व रखता है। यह वह समय है जब सारा वातावरण शक्ति की उपासना के भक्तिमय रंग में सराबोर हो जाता है। साल 2025 का यह पर्व एक विशेष खगोलीय संयोग के कारण और भी खास होने जा रहा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस बार शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर, सोमवार से शुरू होकर 1 अक्टूबर, बुधवार तक चलेगी। आमतौर पर नवरात्रि नौ दिनों की होती है, लेकिन 2025 में चतुर्थी तिथि के विशेष योग के कारण यह 10 दिनों तक मनाई जाएगी। इस दुर्लभ स्थिति में अष्टमी और नवमी के साथ-साथ उत्सव का आनंद अधिक समय तक रहेगा।

क्यों हैं 10 दिन? चतुर्थी तिथि के वृद्धि योग का रहस्य

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नवरात्रि की शुरुआत प्रतिपदा तिथि से होती है और समापन नवमी तिथि पर होता है। लेकिन 2025 में, अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि दो दिनों तक रहेगी। यानी, चतुर्थी तिथि की अवधि लंबी होगी। इस तिथि वृद्धि के कारण, नवरात्रि के पारंपरिक नौ दिनों में एक दशमी का दिन भी जुड़ जाता है, जिससे पूजा-अर्चना का समय बढ़ जाता है। साधकों और भक्तों के लिए यह एक शुभ संकेत माना जाता है, क्योंकि देवी की आराधना के लिए अतिरिक्त समय मिलता है।

22 सितंबर 2025: घटस्थापना का शुभ मुहूर्त और विधि

नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना या कलश स्थापना का विधान सबसे महत्वपूर्ण होता है। इसी के साथ मां दुर्गा के नौ दिवसीय पूजन की शुरुआत मानी जाती है।

नवरात्रि 2025
नवरात्रि 2025

 

  • घटस्थापना तिथि: 22 सितंबर 2025, सोमवार

  • प्रतिपदा तिथि प्रारंभ: 21 सितंबर 2025, रविवार रात 09:29 बजे से

  • प्रतिपदा तिथि समापन: 22 सितंबर 2025, सोमवार रात 11:41 बजे तक

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, घटस्थापना के लिए 22 सितंबर को सुबह 06:00 बजे से दोपहर 01:30 बजे तक का समय अत्यंत शुभ मुहूर्त है। इस दौरान कलश की स्थापना करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है। हालाँकि, प्रतिपदा तिथि दिन भर रहने के कारण, तिथि के किसी भी शुभ समय में यह कार्य किया जा सकता है, लेकिन मुहूर्त में करना विशेष लाभकारी होता है।

घटस्थापना की संक्षिप्त विधि:

  1. सबसे पहले पूजा स्थल को स्वच्छ करके वहाँ एक चौकी रखें।

  2. चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर जौ बोएं।

  3. एक मिट्टी का कलश लेकर उसमें गंगाजल, सुपारी, सिक्का, अक्षत (चावल) और साबुत हल्दी डालें।

  4. कलश के मुख पर कलावा बांधें और आम के पत्तों से ढक दें।

  5. कलश के ऊपर नारियल रखकर उसे लाल कपड़े से सजाएं। यह कलश सृष्टि के स्वरूप भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है।

  6. इसके बाद, इस कलश के पास ही मां दुर्गा की मूर्ति या चित्र स्थापित करें और उनका आह्वान करें।

  7. अंत में, घी का दीपक जलाकर मां दुर्गा की आरती करें और पूरे नौ दिनों तक नियमित पूजा का संकल्प लें।

 

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नवरात्रि 2025: दिनवार पूजा विधि और स्वरूप

इस 10-दिवसीय नवरात्रि में देवी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाएगी। तिथि के अनुसार पूजा क्रम इस प्रकार रहेगा:

दिन तिथि देवी का स्वरूप विशेष
दिन 1 22 सितंबर, सोमवार मां शैलपुत्री घटस्थापना, कलश स्थापना। प्रथम दिन की देवी।
दिन 2 23 सितंबर, मंगलवार मां ब्रह्मचारिणी तप और साधना की देवी।
दिन 3 24 सितंबर, बुधवार मां चंद्रघंटा शांति और सौम्यता की देवी।
दिन 4 25 सितंबर, गुरुवार मां कुष्मांडा सृष्टि की उत्पत्ति करने वाली देवी।
दिन 5 26 सितंबर, शुक्रवार मां स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय की माता।
दिन 6 27 सितंबर, शनिवार मां कात्यायनी शत्रु नाशक देवी।
दिन 7 28 सितंबर, रविवार मां कालरात्रि भय और अंधकार का विनाश करने वाली।
दिन 8 29 सितंबर, सोमवार मां महागौरी पवित्रता और शांति की देवी। दुर्गा अष्टमी
दिन 9 30 सितंबर, मंगलवार मां सिद्धिदात्री सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाली। महा नवमी
दिन 10 1 अक्टूबर, बुधवार विजयादशमी इस दिन नवरात्रि का समापन और दशहरा मनाया जाएगा।

नवरात्रि 2025 के विशेष योग और महत्व

  • सोमवार से शुरुआत: नवरात्रि का प्रारंभ सोमवार के दिन होना शुभ माना जाता है, क्योंकि सोमवार भगवान शिव का दिन है और देवी दुर्गा शिव की अर्धांगिनी हैं। इससे पारिवारिक सुख-शांति की प्राप्ति के योग बनते हैं।

  • चतुर्थी का योग: चतुर्थी तिथि की वृद्धि होने से यह नवरात्रि साधना के लिए अत्यंत शक्तिशाली बन जाती है। मान्यता है कि इस दौरान की गई साधना जल्दी फलित होती है।

  • उपवास और साधना: इन दस दिनों में भक्त जप, तप, उपवास और मां दुर्गा के मंत्रों का जाप करके अपनी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। कन्या पूजन का विशेष महत्व है।


नवरात्रि कब-कब मनाई जाती है?

एक आम धारणा है कि नवरात्रि साल में केवल दो बार आती है, लेकिन ऐसा नहीं है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, साल में चार नवरात्र आते हैं:

नवरात्रि 2025
नवरात्रि 2025

 

  1. चैत्र नवरात्र: यह वसंत ऋतु में आता है और हिंदू नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है।

  2. शारदीय नवरात्र: यह सबसे प्रसिद्ध नवरात्र है, जो autumn ऋतु में आश्विन मास में आता है। इसका समापन दशहरे के साथ होता है।

  3. आषाढ़ नवरात्र: यह वर्षा ऋतु की शुरुआत में आता है।

  4. माघ नवरात्र: यह शीत ऋतु में आता है।

आषाढ़ और माघ के नवरात्रों को ‘गुप्त नवरात्र’ कहा जाता है। ये आम जनमानस के बीच कम प्रचलित हैं, लेकिन तांत्रिक साधनाओं और उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

भारत के विभिन्न कोनों में नवरात्रि का स्वरूप

नवरात्रि का त्योहार पूरे भारत में अलग-अलग ढंग से मनाया जाता है, जो इसकी सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है।

  • पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम: यहाँ नवरात्रि ‘दुर्गा पूजा’ के रूप में भव्यता से मनाई जाती है। पंडालों में सजी मां दुर्गा की मूर्तियों की पूजा की जाती है और दशहरे के दिन इन मूर्तियों का जुलूस निकालकर जल में विसर्जन किया जाता है।

  • गुजरात: यहाँ नवरात्रि का पर्व बेहद उल्लासपूर्ण होता है। लोग रातभर ‘गरबा’ और ‘डांडिया’ जैसे पारंपरिक नृत्य करते हैं, जो शक्ति और उत्सव का प्रतीक हैं।

  • दक्षिण भारत (कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश): यहाँ इस अवसर पर घरों में ‘गोलू’ या ‘बोम्मई कोलु’ की प्रथा है, जिसमें देवी-देवताओं की मूर्तियों को सीढ़ीनुमा घरों में सजाया जाता है। महिलाएं एक-दूसरे के यहाँ जाकर आशीर्वाद लेती हैं।

  • उत्तर भारत: यहाँ नवरात्रि के नौ दिनों तक उपवास रखने की परंपरा है। कन्या पूजन का विशेष महत्व है, जिसमें नवमी के दिन छोटी कन्याओं को भोजन कराकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।

नवरात्रि का सार्वभौमिक संदेश

नवरात्रि का पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह हमें एक गहरा संदेश देता है। यह नौ दिन बुराई पर अच्छाई की जीत, अंधकार पर प्रकाश की विजय और अज्ञान पर ज्ञान की सफलता का प्रतीक हैं। यह हमें सिखाता है कि जीवन की हर चुनौती का सामना आंतरिक शक्ति, दृढ़ संकल्प और सच्ची भक्ति से किया जा सकता है। नवरात्रि वह समय है जब हम अपने भीतर की नकारात्मकता (अहंकार, लालच, क्रोध) का विनाश करके सकारात्मकता, शांति और शक्ति को स्थापित करते हैं। यह आत्मिक नवीनीकरण और नए सिरे से शुरुआत करने का पावन अवसर है।

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